शख़्सियत : मोबाइल के जरिए दीवाली, होली, दशहरा, जन्म, मरण और परण का दौर
अब तो मोबाइल में वरमाला डाली जाती है, जीने, मरने की सूचनाएँ दी जाती हैं और मोबाइल के जरिए ही लोग अपनी उपस्थिति भी दर्ज़ करा देते है। मोबाइल के चलन ने आदमी को त्योहार घर बैठे मनाना सिखा दिया है। जन्मदिन की बधाई और शुभकामनाएँ मोबाइल पर दे दी जाती हैं। वैवाहिक जीवन की सालगिरह, नौकरी में प्रमोशन, बच्चे का जन्म सभी कुछ मोबाइल में हो जाता है। शोक संदेशों का प्रसारण, घाटा, नुकता मौसर सभी के लिए मोबाइल जिंदाबाद!
⚫ कवयित्री निधि दाधीच का कहना
⚫ नरेंद्र गौड़
‘‘त्योहारों के प्रति पहले जैसा उत्साह अब रहा नहीं, महज औपचारिकता का निर्वाह कर लिया जाता है। थोड़ा बहुत उत्साह नजर आता भी है तो वह धनिकों के ’महलों’ और ’चैबारों’ में! वरना गरीबों के लिए तो दीपावली, होली, दशहरा, ईद सभी त्योहार एक समान हैं।’’

यह बात निधि दाधीच ने चर्चा में कही। इनका मानना है कि आज संयुक्त परिवारिक व्यवस्था टूट चुकी है। पहले जहां परिवार के सभी सदस्य एक घर में मिल जुलकर रहते थे, वहीं आज सभी तितर बितर होने का दंश झेल रहे हैं। त्योहारों के मौके पर ’वाट्स एप’ के जरिए विडियो के आदान प्रदान हो जाते हैं। फूलझड़ियां, बम पटाखे और दीपमालिका सभी कुछ मोबाइल में होने लगा है।
घर बैठे त्योहार
निधि जी का कहना था कि अब तो मोबाइल में वरमाला डाली जाती है, जीने, मरने की सूचनाएँ दी जाती हैं और मोबाइल के जरिए ही लोग अपनी उपस्थिति भी दर्ज़ करा देते है। मोबाइल के चलन ने आदमी को त्योहार घर बैठे मनाना सिखा दिया है। जन्मदिन की बधाई और शुभकामनाएँ मोबाइल पर दे दी जाती हैं। वैवाहिक जीवन की सालगिरह, नौकरी में प्रमोशन, बच्चे का जन्म सभी कुछ मोबाइल में हो जाता है। शोक संदेशों का प्रसारण, घाटा, नुकता मौसर सभी के लिए मोबाइल जिंदाबाद!
पारिवारिक विघटन
एक सवाल के जवाब में निधि जी ने कहा कि अतीत के दिनों खेती किसानी परिवार को जोड़कर रखती थी। घर के मुखिया के प्रति सम्मान की भावना होती थी, उनका कहना सभी मानते थे, ऐसे में त्योहार मेल मिलाप के संगम हुआ करते थे, लेकिन छोटा परिवार और खुशहाल जीवन की सोच के कारण परिवार के सदस्यों ने अलग रहना उचित समझा, इस वजह से परिवारों का विघटन हो गया। ऐसे में एक साथ त्योहार मनाने की परंपरा भी प्रभावित हुई है।
अमीरों के हिस्से में चले गए त्योहार
निधि जी का कहना था कि आधुनिकीकरण और मशीनीकरण की वजह से हस्तशिल्प की महत्ता नगण्य हो गई है जिसके चलते अनेक लोगों के रोजगार ठप्प हो गए। कौशल प्रवीण होने के बावजूद लोग अपनी आजीविका चलाने में असमर्थ हैं। देश की बहुसंख्यक आबादी निर्धन है, वहीं मुट्ठीभर लोग दूसरों का हक छीनकर लगातार मालामाल हो रहे हैं। दरअसल इन्हीं मुट्ठीभर लोगों ने वार त्योहारों सहित तमाम उपभोक्ता वस्तुओं पर कब्जा कर लिया है, ऐसे में गरीबों की क्या होली दीवाली, दशहरा?
किसी के पास वक्त़ नहीं
एक सवाल के जवाब में निधि जी ने कहा कि शहरीकरण के दबाव, शासकीय नौकरियों के घटते अवसर, पारिवारिक तनाव, आपसी मनमुटाव ऐसे एक नहीं अनेक कारणों से त्योहारों के प्रति उत्साह में कमी आई है। पहले लोगों के पास वक्त ही वक्त था, जबकि आज हर कोई दौड़ भाग रहा है, लेकिन इसके बावजूद समाज में व्रत, त्योहार सहित विभिन्न पर्व अपनी क्षमता के अनुरूप मनाए जाते हैं। यह परंपरा भविष्य में भी जारी रहेगी, क्योंकि मनुष्य मूल रूप से उत्सवधर्मी रहा है।
कविताओं में मिट्ठी की खुशबू
निधि जी की कविताएं पढ़कर लगता है कि वे हमारी किसी और स्मृतियों की तरह हैं। इनमें कवयित्री समय को पार करना चाहती है और समय की विशेष घटनाएं इनकी स्मृति में जगह बना लेती हैं। समय स्मृतियों पर भी प्रहार करता है और अनेक स्मृतियां विस्मृत हो जाती हैं। फिर भी खास स्मृतियों का कोष इनके पास छूट ही जाता है। मालूम हो कि निधि जी उदयपुर के गुरूनानक कन्या महाविद्यालय से हिंदी तथा अंगे्रजी में एमए कर चुकी हैं। भीलवाड़ा (राजस्थान) की सहाड़ा तहसील के छोटे से गांव सालेरा में श्री कृष्ण गोपाल के घर जन्मी निधि ने गांव देहात के जीवन की कठिनाइयों को गहराई से देखा हैं, लेकिन ग्रामीण जीवन की सरलता सहजता ने भी इन पर गहरा रचनात्मक प्रभाव डाला है। इनका कहना है कि ’’मैं अपने गांव सालेरा की माटी की खुशबू और गहराई के साथ कविता के जरिए आत्मसात करना चाहती हूँ।’’
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निधि दाधीच की कविताएं
जगमग दीप जले
अंकुरित निज ललितकलाओं-सी
सुरभित लतिकाएँ
बंजर हुई भूमि में हरियाली संचालित हो
हृदयगति हर पर्ण प्राण हुए
स्वर्ण रश्मियाँ बन सखियाँ
साकार स्वरूप धारण किए
सुख समीकरण जीवन भरती
संजीवनी मधु मधुरता लिए
रावण-राम युद्ध विराम समय
पूर्ण वन धाम किए
गौरव-गिरि-सी अयोध्यापुरी
स्वागत करती रामसिये
विरह संताप समाप्त हुआ
भातृ-प्रजा-नृप पाकर हुई यहीं सृष्टि
मानस-मंदिर से झगमग दीप
प्रज्ज्वलित पा रहे खोई दृष्टि
लौट आई श्री निज निकेतन
कुबेर-वैभव संग धनत्रयोदशी बन
सँवारती फिर स्वयं सँवरती बालाएँ
दिवस वहीं रूपचतुर्दशी पर सब
नारी रक्षार्थ भक्षक पर रक्षक की
विजय पूजित श्रद्धा-भक्ति समेत
चिरस्थाई क्लांत हुई कांति
उज्ज्वल हुई बन विश्रांति
विषाद-मुक्ति समेत
उत्पल ज्यौं उत्पन्न हर्ष
मुक्ताओं-सी सुकृति हर नगरी
चंचला चाँदनी व नीलम मिल
अवसर दे रहे चमकने को बुद्बुद से धरती
शबरी को भक्ति शफरी को
नीर ज्यौं मिले अयोध्या को राम
यह प्रकाश झिलमिल मिल जाए सदा
ज्योंति स्वरूप निर्मित भारत को
पल्लवित संस्कार-सभ्यता का आगाज
हो खिले समृद्धि-पुष्प अनेक
वीरता आशाओं रूपी वल्लकी बढ़़ती ही रहे
श्रृंखला बन फूले नेह
त्योंहारो की लीक देती सदा ही सीख
गोवर्धन पूजा और भाईदूज पर्व अनोखा
कविता रूपी सविता में सुकोमल समरसता के
सुमन खिल प्रगाढ़ हो भरोसा
साधना यहीं यहीं आराधना
मंगलकारी की हितकामना
बसे सुखी संसार सागर-सी साधना
स्फुरित हो सबकी सद्भावना।
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जीने को खुलकर
उद्वेग का बहता वेग थामकर
फैला समूल भ्रम त्यागकर
मिटाते सारे शिकवे दो आँसू छलककर
कटु सारे वचन दफ़न कर
अशांत मान को तनिक शांत कर
मिठास घोलते दो मीठे बोल गूँजकर
अँधियारी का दिया जलकर
तपस्वी तक करता वहीं तक कर
तेजस्वी उस-सा न होगा कभी दिनकर
महकते बाग सुंदर बनकर
तूणीर से तीर तुरंत तनकर
बढ़ती नहीं कौन सी दुविधा में डूबकर
कठिन इतना जटिल है सोचकर
बाधाओं के बाँध और सुदृढ़ कर
सुर बुलंद बंधन खोलते
जीने को खुलकर।
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वाणी माँ सरस्वती
शोण कोण पर मन व्याकुल-सा गहरा
अरुण जलज-सी प्रतिच्छवि
नव तुषार-सी छाया
धवल कमल पर श्वेत स्वरूप
उदय विजयिनी
कोमल पुष्पावली मध्य सुंदर
मानस हंस मनस्वी
गुँजारित मौन श्रृंगनाद ध्वनि
करती दिवा आलोक रश्मियाँ
मुक्त गगन के उर में उदास मन
उल्लसित देख देवी शक्तियाँ
निशा तपस्विनी करती
वर्षा धूप शिशिर में छाया
स्मृति पटल पर छाई चाँदनी-सी
तंद्रा मानो कोई आया
धूसर-सी दिखती तनिक
और निखरी जान पडती
निरंतर प्रयास करती मूढ़ बुद्धि
मर्म क्या है?जानती
तनिक कुशल कल्पनाओं के
नील निलय तले
चेतन स्वरूप सिंहासन शोभित
कलश ज्यौं सजे
सुंदर अलौकिक वेद विद्या रूप धारण किए
नमन माँ गिरा वीणापाणी
वाणी माँ सरस्वत्यै।

Hemant Bhatt