खरी खरी : सैम्पल फेल होने का इंतजार या सेहत से खिलवाड़ का लाइसेंस?
जब तक संदिग्ध दुकानों और रेस्टोरेंटों पर रिपोर्ट आने तक सख्त व्यावसायिक पाबंदियां नहीं लगाई जाएंगी, तब तक ऐसी कार्रवाइयां सिर्फ एक खानापूर्ति बनी रहेंगी। प्रशासन को अपनी लचर कार्यशैली से बाहर निकलकर यह जवाब देना होगा कि आखिर मिलावट की शंका और रिपोर्ट के इंतजार के बीच फंसी आम जनता की सेहत का असली रखवाला कौन है?
⚫ खाद्य विभाग की ढुलमुल कार्यप्रणाली पर उठते गंभीर सवाल
⚫ आखिर मिलावट की शंका और रिपोर्ट के इंतजार के बीच फंसी आम जनता की सेहत का असली रखवाला कौन है?
⚫ हेमंत भट्ट
रतलाम और जावरा सहित जिले के विभिन्न क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा विभाग की हालिया छापामार कार्रवाई ने एक बार फिर प्रशासन के ढुलमुल रवैये और आम जनता की सेहत से हो रहे खिलवाड़ को उजागर कर दिया है। खाद्य सुरक्षा अधिकारी अमला रतलाम के समता सागर होटल से पनीर, काबुली चना और रेड चेरी, होटल सेंट्रल बालाजी (सैलाना रोड) से बटर, तथा जावरा के न्यू जैन ढाबा और होटल श्री रमैया पैलेस से दही, पनीर और रिफाइंड सोयाबीन तेल के नमूने (सैम्पल्स) लिए गए।

कागजों में तो कार्रवाई पूरी दिखती है। नमूने भोपाल स्थित 'राज्य खाद्य परीक्षण प्रयोगशाला' भेज दिए गए हैं और कहा जा रहा है कि "रिपोर्ट आने के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।" लेकिन सवाल यह उठता है कि जब तक रिपोर्ट नहीं आती, तब तक क्या?
रिपोर्ट आने तक जनता की सेहत का जिम्मा किसका?
जांच रिपोर्ट आने में हफ्तों या महीनों लग जाते हैं। इस पूरी अवधि के दौरान ये होटल और रेस्टोरेंट बेफिक्र होकर अपना व्यवसाय चलाते रहते हैं। जिन खाद्य पदार्थों पर मिलावट का संदेह जताकर विभाग ने नमूने उठाए हैं, वही खाद्य पदार्थ रोजाना सैकड़ों आम नागरिक और उनके बच्चे खा रहे हैं।
यदि जांच रिपोर्ट में नमूने 'अमानक' (मिलावटी या असुरक्षित) पाए जाते हैं, तो इस दौरान जिन लोगों ने वह खाना खाया, उनकी सेहत पर हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा? क्या विभाग के पास इस बात का कोई जवाब है?
तुरंत सीलिंग/अस्थायी रोक क्यों नहीं?
जनहित और स्वास्थ्य सुरक्षा का तकाजा तो यह कहता है कि जिन खाद्य सामग्रियों पर गंभीर संदेह हो, उनके उपयोग या बिक्री पर रिपोर्ट आने तक कम से कम अस्थायी रोक लगाई जाए या संबंधित होटल के उस सेक्शन को सील किया जाए। लेकिन विभाग की ढिलाई का आलम यह है कि दुकानें और रेस्टोरेंट बदस्तूर चलते रहते हैं।
प्रशासन की इसी "लेट-लतीफी" के कारण मिलावटखोर बेखौफ हैं। दुकानदारों में कार्रवाई का कोई डर नहीं दिखता, क्योंकि उन्हें मालूम है कि प्रक्रिया इतनी लंबी है कि तब तक वे मुनाफा कमा चुके होंगे।
'फोटो-सेशन' बनाम 'ठोस कार्रवाई'
जनता के बीच अब यह आम चर्चा है कि विभाग की कार्रवाई महज एक पब्लिसिटी स्टंट या फोटो-सेशन बनकर रह गई है। खबरों में फोटो छपवाकर यह तो दिखा दिया जाता है कि प्रशासन मुस्तैद है, लेकिन धरातल पर आमजन की जेब और सेहत—दोनों से खिलवाड़ जारी रहता है।
विभाग कभी स्पष्ट रूप से यह खुलासा नहीं करता कि:
भोपाल प्रयोगशाला से रिपोर्ट आने की समय-सीमा क्या है?
जांच रिपोर्ट लंबित रहने के दौरान जनता की सुरक्षा के लिए क्या सुरक्षात्मक कदम उठाए गए हैं?
समय आ गया है कड़े फैसलों का
खाद्य सुरक्षा विभाग का काम केवल नमूने एकत्र कर भोपाल भेजना नहीं, बल्कि नागरिकों को सुरक्षित भोजन सुनिश्चित कराना है। जब तक संदिग्ध दुकानों और रेस्टोरेंटों पर रिपोर्ट आने तक सख्त व्यावसायिक पाबंदियां नहीं लगाई जाएंगी, तब तक ऐसी कार्रवाइयां सिर्फ एक खानापूर्ति बनी रहेंगी। प्रशासन को अपनी लचर कार्यशैली से बाहर निकलकर यह जवाब देना होगा कि आखिर मिलावट की शंका और रिपोर्ट के इंतजार के बीच फंसी आम जनता की सेहत का असली रखवाला कौन है?
Hemant Bhatt