विश्व शहर दिवस' और रतलाम का कड़वा सच : स्वाद और सुकून के बीच खाली होता शहर
रतलाम को पुनः जीवंत करने की रणनीति विश्व शहर दिवस के अवसर पर रतलाम के नीति-निर्धारकों, जनप्रतिनिधियों और नागरिकों को मिलकर एक संकल्प लेने की जरूरत है। रतलाम को केवल "मकानों का शहर" बनने से रोकने के कदम तत्काल उठाए जाने चाहिए।
'विश्व शहर दिवस' और रतलाम का कड़वा सच : स्वाद और सुकून के बीच खाली होता शहर
एक विश्लेषण : हेमंत भट्ट
31 अक्टूबर को जब दुनिया 'विश्व शहर दिवस' मना रही है और सतत शहरी विकास के सपने बुन रही है, तब मालवा के मध्य में स्थित रतलाम एक अजीब और दुखद विरोधाभास से गुजर रहा है। एक तरफ रतलाम की तासीर में अनूठा सुकून, बेमिसाल स्वाद और अपनापन है, तो दूसरी तरफ रोजगार के अभाव और थमी हुई राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण यह शहर धीरे-धीरे खाली हो रहा है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने संकल्प 68/239 के तहत 31 अक्टूबर को 'विश्व शहर दिवस' (World Cities Day) के रूप में मनाने की घोषणा की थी। इसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक शहरीकरण की चुनौतियों से निपटना, टिकाऊ शहरी विकास को बढ़ावा देना और शहरों को रहने योग्य बनाना है। लेकिन रतलाम के संदर्भ में देखें तो यह दिन उत्सव से ज्यादा चिंतन और चिंता का विषय बन जाता है। रतलाम की विडंबना यह है कि जहाँ अन्य शहरों में आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों से लोग आकर बसते हैं, वहीं रतलाम एक ऐसा शहर बनता जा रहा है जहाँ लोग आकर रहना नहीं चाहते—बल्कि जो यहाँ के मूल निवासी हैं, वे भी इसे छोड़ रहे हैं।
पलायन का दर्द: "मकानों का शहर, इंसानों का नहीं"
चिंतक वैद्य रत्नदीप निगम का कहना है कि पिछले चार दशकों में रतलाम के सामाजिक ढांचे में एक बड़ा बदलाव आया है। रतलाम में पढ़ाई पूरी करने के बाद युवाओं के पास ठहरने की कोई ठोस वजह नहीं बचती। इसका सीधा असर परिवारों पर पड़ा है। रेलवे का इतना बेहतरीन प्रमुख केंद्र सड़क मार्ग की भी पूरी सुगमता के बावजूद व्यावसायिक और औद्योगिक घरानों को आकर्षित नहीं कर पाए। इतना ही नहीं रतलाम के 15 किलोमीटर रेडियस में रहने वाले गांव की लोग भी रतलाम में जाकर रहना नहीं चाहते हैं। शहर में रहने की उनकी रुचि नहीं है। गांव में ही बेहतरीन आलीशान बड़े-बड़े बंगले बना लिए हैं। गाड़ी मोटर की सुविधाएं हैं। रतलाम शहर में रहने वालों से बेहतर जिंदगी तो गांव वाले जी रहे हैं।
सूने मकान और लटके ताले: शहर में कई बुजुर्ग दंपत्ति या तो अकेले रह रहे हैं या फिर 6 महीने रतलाम में और 6 महीने देश-विदेश में बसे अपने बच्चों के साथ बिता रहे हैं। कई शानदार मकानों पर ताले जड़े हैं या वे किराएदारों के भरोसे हैं।
भविष्य की डरावनी तस्वीर: यदि यही गति रही, तो आने वाले समय में रतलाम सिर्फ "इमारतों और मकानों का शहर" बनकर रह जाएगा, जहाँ रहने वाले जीवंत परिवार गायब हो चुके होंगे।
रोजगार का अकाल और शोषण का चक्र
रतलाम से प्रतिभाओं के पलायन का सबसे मुख्य और एकमात्र बड़ा कारण है—स्थानीय स्तर पर रोजगार और औद्योगिक विकास का पूरी तरह ठप होना।
प्राइवेट सेक्टर की लाचारी: शहर में बड़े उद्योगों और आईटी/कॉर्पोरेट सेक्टर का सर्वथा अभाव है। छोटे-मोटे निजी संस्थानों या दुकानों में जो काम उपलब्ध भी हैं, वहाँ शोषण की पराकाष्ठा है।
कम वेतन, ज्यादा काम: 10 से 12 घंटे की सख्त मजदूरी/नौकरी के बदले युवाओं को महज 10,000 से 12,000 रुपये का मानदेय थमा दिया जाता है। ऐसे में आज की शिक्षित और महत्वाकांक्षी युवा पीढ़ी के पास इंदौर, भोपाल, मुंबई या बेंगलुरु जैसे शहरों का रुख करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
राजनीतिक इच्छाशक्ति का शून्य और प्रशासनिक उदासीनता
शहर की इस दुर्दशा के पीछे स्थानीय नेतृत्व और प्रशासनिक रवैये की बड़ी नाकामी है।
राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी: दशकों से रतलाम को राजनीतिक रूप से वह विज़न नहीं मिला जो इसे एक इंडस्ट्रियल या एजुकेशनल हब बना सकता था। वादे और घोषणाएं बहुत हुईं, लेकिन धरातल पर रतलाम को 'श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम' बनाने की नीयत नजर नहीं आई।
"नौ-करी" की मानसिकता: प्रशासनिक तंत्र का हाल यह है कि अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी शहर के विकास के लिए कोई इनोवेटिव कदम उठाने के बजाय सिर्फ '1 तारीख' (वेतन) का इंतजार करते हैं। जनसेवा की गरिमा बढ़ाने की बजाय ऊपरी कमाई और तीन-चार गुना दाम में काम कराने की मानसिकता हावी है।
रतलाम का दूसरा पहलू: बेमिसाल स्वाद, किफायती जीवन और अटूट अपनापन। इतनी कमियों और पलायन के बावजूद, रतलाम की एक ऐसी अनूठी पहचान है जो दुनिया के किसी कोने में नहीं मिलती। जो लोग रतलाम छोड़कर चले भी गए हैं, उनके दिल का एक हिस्सा हमेशा यहीं धड़कता है।
लाजवाब स्वाद और सेहत: रतलाम के पोहे, कचोरी, समोसे, लजीज नमकीन (रतलामी सेव), जलेबी और आलू बड़े का स्वाद दुनिया में बेजोड़ है। यहाँ स्वाद के साथ सेहत और सद्भावना भी मुफ्त मिलती है।
सस्ता और किफायती व्यापार: रतलाम में प्रतिस्पर्धा और खरीदारों की सीमित संख्या के कारण व्यापारी बेहद किफायती दामों में सामान उपलब्ध कराते हैं। अन्य बड़े शहरों की तुलना में यहाँ जीवनयापन काफी सस्ता है।
भागम भाग से मुक्ति और आत्मीयता: यहाँ की हवा में ठहराव और सुकून है। दिन में एक ही व्यक्ति आपको चार अलग-अलग चौराहों पर मुस्कुराता हुआ मिल जाएगा। लोग 15-20 दिन देश-विदेश घूमने जाते हैं, लेकिन लौटकर यही कहते हैं—"जो सुकून और अपनापन रतलाम में है, वो दुनिया में कहीं नहीं!"
आगे का रास्ता: रतलाम को पुनः जीवंत करने की रणनीति
विश्व शहर दिवस के अवसर पर रतलाम के नीति-निर्धारकों, जनप्रतिनिधियों और नागरिकों को मिलकर एक संकल्प लेने की जरूरत है। रतलाम को केवल "मकानों का शहर" बनने से रोकने के लिए निम्नलिखित कदम तत्काल उठाए जाने चाहिए।
औद्योगिक कॉरिडोर और एमएसएमई (MSME) का गठन: रतलाम को दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे का जो लाभ मिल सकता है, उसे भुनाते हुए यहाँ लॉजिस्टिक्स हब और खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) उद्योगों को प्राथमिकता दी जाए।
स्थानीय स्टार्टअप्स और सेवा क्षेत्र को बढ़ावा: आईटी और सर्विस सेक्टर की छोटी कंपनियों को रतलाम में केंद्र खोलने के लिए टैक्स छूट और ढांचागत सुविधाएं दी जाएं।
प्रशासनिक जवाबदेही: सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार और 'ऊपरी कमाई' की प्रवृत्ति पर नकेल कसते हुए पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित शासन व्यवस्था लागू की जाए।
समान काम, सम्मानजनक वेतन: असंगठित और निजी क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन और कार्य-घंटों का सख्ती से पालन कराया जाए।
मुद्दे की बात
रतलाम सिर्फ एक भौगोलिक शहर नहीं, बल्कि एक अहसास और गौरवमयी संस्कृति है। रतलाम के निवासियों को अपने रतलामी होने पर गर्व है, लेकिन अब वक्त आ गया है कि यहाँ के जनप्रतिनिधि और शासन भी ऐसा काम करें कि रतलाम उन पर गर्व कर सके। रोजगार के द्वार खोलकर ही हम अपनी युवा पीढ़ी को रोक सकते हैं और रतलाम की रगों में फिर से जीवन का संचार कर सकते हैं।
Hemant Bhatt