सामाजिक सरोकार : गैस कंपनियों की मनमानी और तकनीकी खामियों से रतलाम के वयोवृद्ध परेशान
संवेदनशील मुद्दे पर रतलाम जिले के जागरूक नागरिकों, प्रबुद्धजनों और पीड़ित परिवारों ने मांग की है कि: जिला प्रशासन ले स्वतः संज्ञान: रतलाम जिला कलेक्टर और जिला प्रशासन को तुरंत इस मामले में हस्तक्षेप कर गैस कंपनियों (भारत गैस, एचपी और इंडेन) के अधिकारियों की बैठक बुलानी चाहिए।
⚫ केवाईसी के नाम पर जीवित बुजुर्गों के सामने खड़ा हुआ अस्तित्व का संकट
दिनेश दवे
रतलाम, 30 अक्टूबर। शहर और पूरे जिले में एलपीजी गैस कनेक्शन के ई-केवाईसी (KYC) की अनिवार्यता व तकनीकी अड़चनों ने बुजुर्गों के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है। एक तरफ जहां उम्र के इस पड़ाव पर वृद्धों के लिए घर से निकलना और लाइनों में खड़े होना कठिन है, वहीं दूसरी तरफ बायोमैट्रिक सिस्टम (फिंगरप्रिंट और रेटिना स्कैन) की नाकामी ने उन्हें और अधिक लाचार बना दिया है। रतलाम में गैस कंपनियों के इस कड़े और अव्यवहारिक रवैये के कारण सैकड़ों बुजुर्ग और उनके परिवार मानसिक व आर्थिक परेशानी झेल रहे हैं।

बायोमैट्रिक मिलान में विफलता
बढ़ती उम्र के कारण कई वृद्ध पुरुषों और महिलाओं के फिंगरप्रिंट (उंगलियों के निशान) और आंखों का रेटिना कमजोर हो गया है या घिस गया है, जिसे गैस कंपनियों के डिजिटल स्कैनर कैच नहीं कर पा रहे हैं।
सिस्टम की नाकामी की सजा भुगत रहे बुजुर्ग:
पोरवाड़ों का वास निवासी 85 वर्षीय रुक्मणि(पति स्वर्गीय शांतिलाल जी) का मामला इसका जीता-जाता उदाहरण है। वह खुद अलकापुरी स्थित भारत गैस कंपनी के कार्यालय पहुंचीं, जहां उन्होंने एक घंटे से अधिक समय तक लगातार फिंगरप्रिंट और आंखों का रेटिना स्कैन कराया, लेकिन कंपनी के कंप्यूटर ने इसे स्वीकार नहीं किया।
अव्यवहारिक सलाह और आर्थिक बोझ
जब पीड़ित वृद्धा ने कंपनी के मैनेजर से इस समस्या को लेकर चर्चा की, तो समाधान करने के बजाय उन्हें 4,750 रुपये जमा कर कनेक्शन परिवार के किसी अन्य सदस्य के नाम ट्रांसफर करवाने की सलाह दी गई।
गरीब और जरूरतमंदों पर दोहरी मार
जिले के सैकड़ों ऐसे वयोवृद्ध हैं जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। ऐसे में केवल बायोमैट्रिक फेल होने की वजह से उन पर आर्थिक बोझ डालना या गैस सब्सिडी/कनेक्शन बंद होने का खतरा पैदा करना पूरी तरह अनुचित है।
"जीवित वृद्धों का क्या दोष?" – उठ रहे गंभीर सवाल
स्थानीय नागरिकों और पीड़ितों का कहना है कि यदि गैस कंपनियों का तकनीकी सिस्टम उम्रदराज लोगों के शारीरिक बदलावों को स्वीकार नहीं कर पा रहा है, तो इसमें जीवित वृद्धों की क्या गलती है? क्या उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचना नागरिकों का अपराध है? नियम कागजी औपचारिकताओं के लिए होने चाहिए, न कि आमजन और बुजुर्गों की जान हलाकान करने के लिए। घर-घर जाकर गैस सिलेंडर उपलब्ध कराने के दावे करने वाली एजेंसियां आज बुजुर्गों को दफ्तरों के चक्कर कटवाने और घंटों बैठाए रखने पर मजबूर कर रही हैं।
जनहित में तत्काल कार्रवाई की मांग
इस संवेदनशील मुद्दे पर रतलाम जिले के जागरूक नागरिकों, प्रबुद्धजनों और पीड़ित परिवारों ने मांग की है कि:
जिला प्रशासन ले स्वतः संज्ञान: रतलाम जिला कलेक्टर और जिला प्रशासन को तुरंत इस मामले में हस्तक्षेप कर गैस कंपनियों (भारत गैस, एचपी और इंडेन) के अधिकारियों की बैठक बुलानी चाहिए।
वैकल्पिक सत्यापन की व्यवस्था हो
जिन वृद्धों के बायोमैट्रिक (फिंगरप्रिंट/रेटिना) मैच नहीं हो पा रहे हैं, उनके लिए आधार कार्ड, बैंक पासबुक या अन्य दस्तावेजों के आधार पर भौतिक सत्यापन (Manual Verification) का सरल विकल्प दिया जाए।
एजेंसियों की मनमानी पर रोक
केवाईसी के नाम पर वृद्धों पर जबरन पैसे थोपने या कनेक्शन ट्रांसफर के नाम पर आर्थिक वसूली करने वाली गैस एजेंसियों पर नकेल कसी जाए।
जनप्रतिनिधि उठाएं आवाज
रतलाम के स्थानीय जनप्रतिनिधियों (सांसद, विधायक) को आगे आकर बुजुर्गों की इस पीड़ा का समाधान करवाना चाहिए ताकि किसी भी वृद्ध को गैस आपूर्ति से वंचित न होना पड़े।
मुद्दे की बात
यह खबर रतलाम के प्रशासनिक अधिकारियों, गैस एजेंसी संचालकों और जनप्रतिनिधियों को संज्ञान में लेनी चाहिए ताकि समय रहते इस अमानवीय व्यवस्था में सुधार हो सके और हमारे बुजुर्गों को राहत मिल सके।
Hemant Bhatt