साहित्य सरोकार : पुस्तक समीक्षा - "सुनो जरा"

खुदेजा की कविताएं हालांकि छोटी होती हैं लेकिन इनमें दुर्लभ अर्थ विस्तार है, जिसकी आवाज दूर तक जाती है। एक समर्थ रचनाकार की क्षमता का परिचय देती इनकी कविताओं में भी गजलों की दुनिया इस कदर घुली मिली हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता है।

साहित्य सरोकार : पुस्तक समीक्षा - "सुनो जरा"

मेहनत के पसीने से रची कवयित्री खुदेजा ख़़ान  ने अपनी कविताओं की दुनिया

⚫ नरेंद्र गौड़ 

खुदेजा ख़ान हिंदी की कवयित्री ही नहीं उर्दू की शायरा भी हैं और यही वजह है कि इनकी रचनाओं में उर्दू जबान की लचक और लोच मौजूद है जो कविता को अर्थ की उस दुनिया तक ले जाती है, जहां काव्य का रूखापन और खराश गायब होकर सहजता पैदा करता है।

कवयित्री खुदेजा खान

भोपाल में जन्मी खुदेजा हिंदी और संस्कृत में एम ए कर चुकी है, यहां यह बताना इसलिए जरूरी था, क्योंकि इससे किसी कवि की भाषा पर पकड़ का पता चलता है। हिंदी, संस्कृत और इनकी मादरी जबान उर्दू कविता के कहन को कहीं अधिक सक्षम बनाती हैं। इनकी गजलों का संग्रह ’सपना सा लगे’, कविता संग्रह ’संगत’, उर्दू नज््म संकलन  ’आबगीना’ और हिंदी-उर्दू रचनाओं का मिला जुला संकलन ’फिक्र ओ फन’ प्रकाशित तथा चर्चित है। इसके अलावा करीब एक दर्जन से अधिक साझा संकलनों में इनकी रचनाएं शामिल हो चुकी हैं। कविता के अलावा आपने लघुकथा, कहानी, हाइकू, नाटक भी लिखे। आजकल संपादन और समीक्षा की दुनिया से भी बाबस्ता हैं। ई-पत्रिका ’ग्लोबल साहित्य सारांश’ (त्रैमासिक) की सम्पादक, वनप्रिया का सह सम्पादन एवं ’किस्सा कोताह’ (त्रैमासिक) के सम्पादन मण्डल में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। कहने का मतलब यह कि कहने की बेहतर क्षमताएं इनके पास हैं। 


आकाशवाणी और दूरदर्शन से इनकी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैें। आप सामाजिक संस्था ’महात्मा गांधी बाल एवं महिला कल्याण’ से  संम्बध्द हैं, ’कादम्बरी साहित्यिक एव सांस्कृतिक संस्था की अध्यक्ष रह चुकी हैं, आपको साकीबा गायत्री देवी अग्रवाल रचना सम्मान सहित अनेक पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है, हाल ही में साहित्यिक सेवा के लिए ’वामा सम्मान’ नागपुर मिला है।


जगदलपुर ( छत्तीसगढ़) में रह रही खुदेजा की कविताएं हालांकि छोटी होती हैं लेकिन इनमें दुर्लभ अर्थ विस्तार है, जिसकी आवाज दूर तक जाती है। एक समर्थ रचनाकार की क्षमता का परिचय देती इनकी कविताओं में भी गजलों की दुनिया इस कदर घुली मिली हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। खुदेजा  की कविताएं जो कुछ भी दृश्यमान जगत है, उसके भीतर तक जाकर जीवन के विभिन्न आयामों की गहरी पड़ताल करती हैं। यह रचनाएं अनुभव और हकीकत से सराबोर, ताजा अभिव्यक्ति कही जा सकती हैं, जो मुक्तिबोध की कला के तीनों क्षणों का निर्वाह करती, काट देने के बाद फिर से बार-बार बहुत मेहनत के पसीने से सींचकर लिखी और रची गई हैं। यदि महसूस करने की क्षमता और संवेदना है तो इनके शब्द-शब्द में उम्मीद की रोशनी है, लेकिन कहीं-कहीं गहरी हताशा और निराशा के स्वर भी हैं। वहीं रोशनी की एक बूंद को अपनी मुट्ठी में बंद कर लेने का खेल है तो यह प्रश्न भी है कि आजाद चीज़ों को क़ैद करने का ऐसा खेल क्यों होता है? 
यहां कभी न लौट सकने वाले बचपन की स्मृतियां हैं, लेकिन बहुत अधिक नहीं। वक्त का एक दौर ऐसा था, जबकि हिंदी के अधिकांश कवि मां, पिता, बच्चों और फूल -पत्तियों पर कविताएं लिखे जा रहे थे, इनकी कविताएं उस मोह से मुक्त हैं। यह कविताएं अपनी बात कहने के लिए किसी कविताई कौतुक, अलंकारिता या भाषायी बंतुपन का आसरा नहीं ढूंढ़ती और न इनमें वह पर्यटन वाला नजरिया है, जिसमें देखी भाली जगहों को लेकर कच्ची कविताओं की भरमार होती है। खुदेजा के पांव अपनी जमीन को पहचानते हैं और अपने आसमान को भी।
कविता की पंक्तियां देखें -


लिखने की चेष्टा में 
लिखा गया बहुत कुछ अनावश्यक
वही छूट गया लिखने से
जिसकी कौंध ने
किया था ध्यानाकर्षित।


व्दारिकाप्रसाद मिश्र के मुख्यमंत्री रहते जगदलपुर के राजा प्रवीरचंद भंजदेव हत्याकांड हुआ था, जिसमें बहुत से अदिवासी भी मारे गए थे। इस घटना के बाद बस्तर में नक्सलवाद ने जन्म लिया जिसकी जड़ें जंगलों को आदिवासियों से महरूम किए जाने की व्यथाकथा को आत्मसात किए हुए  हैं। सरकार को वहां पूंजीपतियों का भरपूर संरक्षण मिला है और रोटी- रोजगार के संसाधन छीने जा रहे हैं, इन सभी से खुदेजा की कविता प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष रूप से प्रभावित है।


इनके अस्तित्व को 
समूल नष्ट करके वे लोग
करना चाहते हैं 
अपना वर्चस्व स्थापित
उनका दावा है -
इनसे अधिक महत्वपूर्ण है
हमारा वर्चस्व


ये कविताएं उन दृश्यों को सामने रखती हैं जो अतिपरिचित है, सभी के देखे-भाले हैं। ये कविताएं जीवन के बहुत जरूरी और अनिवार्य सवालों को बेलाग ढंग से बेखौफ होकर उठाती हैं। इनमें किसी तरह का संकोच या हकलाहट नहीं है। पुरूष सत्तात्मक समाज में स्त्री की अस्मिता से जुड़े सवालों को भी खुदेजा ने उठाया है। इन कविताओं में वासंती फूलों और लचकती डालियों से लबरेज ताजगी है तो कहीं कुछ ऐसे भाव भी उतरे हैं जो हर वक्त जी में एक हलचल-सी मचाए रहते हैं। यह कविताएं विमर्श के सीमित दायरों में अपने को कैद नहीं रखतीं, वह उससे बाहर आकर उन सच्चाइयों को देखने की कोशिश करती हैं। 
इनमें एक शायर का आशावाद है और यही कि कभी तो वक्त का दौर बदलेगा-


 पत्थरों की गहराई में
 दबा हुआ बीज
 कौन जाने निकल आये कब
 चट्टानों से बाहर 
 अपनी निशानदेही करता हुआ
 कहे-’देखो मैं जिंदा हूं’
और तुम हो कि मायूस हुए जाते हो।


दुनिया में अगर शब्द न होते तो वह वैसी न होती, जैसी, अब है। यहां शब्द से तात्पर्य उस सर्जनात्मक साहित्य से है जो मानव चेतना को अधिक उदात्त, परिष्कृत, संस्कारित संवेदनशील और सही अर्थों में ’मानवीय’ बनाने में अपनी महती भूमिका अदा करते हैं। खुदेजा के लिए भाषा चेतना की आवाज है, वह प्राणों की कुलबुलाहट है। जाहिर है कवयित्री बड़ी नहीें, उसकी कविता बड़ी है, फूल बड़ा नहीं उसकी सुगंध बड़ी है। यही तमीज और समझ यह कविताएं सिखाने की कोशिश करती हैं, दिमाग के पन्ने आंसुओं के सैलाब में बेहिसाब धुलकर भी यहां कोरे के कोरे रह जाने का दर्द है। खुदेजा विराट संभावनाशील कवयित्री हैं। यह कविताएं मनुष्यता की  स्थापना के लिए प्रतिबद्ध उसके चिंतन का गुलदस्ता है, जिसके फूल प्रेम की सुगंध से सराबोर हैं। यह गहरी संवेदना और आत्मीयता से दमकती कविताएं हैं। कविता अगर प्रश्न करना भूल जाए, कविता अगर पाठक के मन को झकझोरना भूल जाए या कविता सिर्फ राग दरबारी के आलाप में तल्लीन हो जाए तो समझ लेना चाहिए कि कविता अपने चरित्र, व्यक्तित्व, धर्म और उद्देश्य को भूल चुकी है। 


जगदलपुर के आसपास बस्तर के इलाके में अनेक समृद्ध लोह की खदानें हैं और यह लोगों की आजीविका का साधन भी है। यही वजह है कि खुदेजा की कविता में लोहे का जिक्र प्रकारांतर से हुआ है।कठोर धातु प्रेम जनित उष्मा में पिघलती है। 
कठिन है पिघलने के 
तापमान मूलक बिंदू तक पहुंचना
उच्च गलनांक अप्रभावित रहता है
स्नेह की मध्दम आंच में।
इनकी कविताओं में उत्तर की तलाश में भटकता हुआ प्रश्न, संक्रमित व्यवस्था का टीकाकरण नहीं हो पाना, शुभ योग संयोग में प्रेम की तलाश, भीड़ को चीरती एम्बूलेंस की आवाज जैसी एक दो नहीं अनेक जीवन स्थितियां हैं। लोहे की खदानों के आसपास खुदेजा रहती जरूर हैं ,लेकिन इनकी कविताएं मानवीय संवेदनाओं से बहुत गहरे अनुप्राणित हैं।


 वजूद बुलबुले सा
 जिंदगी पहाड़ सी 
 मिली जैसे कोई लताड़ सी
 टूटी जो कभी लगी कांच सी


 यहां एक बात और किसी भी कवि को पढ़ते समय पाठक यही ढूंढता है कि उसमेें नया क्या है और कितना चैकन्ना है, वह अपने समय और आसपास के जीवन को देखने, जानने बूझने के लिए। इनमें वह आत्मीयता है जिसका जवाब नहीं। इन कविताओं के आंचल में उनींदे स्वप्न और ढेर सारी कल्पनाओं को भेंट करने के अलक्षित कोनें हैं, लेकिन कविता के किसी भी हिस्से को अलग करके उद्धृत करना मुश्किल है, पूरा संकलन एक कहानी है। वस्तुतः ये कविताएं एक मुकम्मल इकाई की तरह हैं। इसलिए उन्हें हिस्सों में नहीं पढ़ा जा सकता। कई बार तो किसी पंक्ति या पंक्तियों को अलग करके रखने में यह भी डर होता है कि संदर्भ से कट जाने पर उसका अर्थ ही न बदल जाए! संकलन में एक से बढ़कर एक लाजवाब कविताएं हैं। जिसके पन्ने दर पन्ने खोलते जाइए आप दंग हुए बिना नहीं रहेंगे।

 मुझे पूरा विश्वास है इस संग्रह को पढ़ने के बाद आप विचलित हुए बिना भी नहीं रह सकते और इसकी अनेक कविताएं और अनेक पंक्तियां आपके मन में उतरकर आपकी स्मृतियों के पत्थर पर लकीर की तरह अंकित हो जाएंगी। इसमें अनेक जरूरी कविताएं हैं मसलन ’अपने बल पर, दोस्त, जीवन लीला, पैसा कभी अछूत नहीं हुआ, चमकीले पल, मेरा मैं, सुनो जरा, मकबरा, एक प्रजाति का रुदन आदि। खुदेजा खान के संकलन ’सुनो जरा’ को न्यू वल्र्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली 110012, ने प्रकाशित किया है।