बहरों को इंकलाब की आवाज सुनाने को किया था  भगतसिंह ने बम विस्फोट  

बहरों को इंकलाब की आवाज सुनाने को किया था  भगतसिंह ने बम विस्फोट  

डॉ. प्रदीपसिंह राव, वरिष्ठ इतिहासकार

8अप्रैल 1929 दिल्ली  की सेंट्रल असेंबली, जो बाद में संसद भवन  बना, उसमे वायसराय "पब्लिक सेफ्टी बिल" पर कानून बनने वाला था जो श्रमिकों के लिए दमनकारी था। इसे पास न होने देने के लिए भगतसिंह और दत्त ने एक दिन पहले मुआयना किया था।निर्णय लिया था कि गैलरी से बम फेंकेंगे लेकिन जनहानि न होने देंगे।

यही हुआ 8 अप्रैल 1929 को दोपहर में चल रही चर्चा के बीच दोनों क्रांतिकारियों ने एक एक कर बम लुढ़का दिए। जोर का धमाका हुआ और धुंए से अंधेरा छा गया। खचाखच भरे सदन में अफरा तफरी मच गई। पुलिस ने गेट बंद कर दिए ताकि दोषी भाग न सके। लेकिन भगत सिंह और दत्त ने खुद ही सरेंडर कर दिया।उस दौरान ऊपर गैलरी से बड़ी तादाद में परचे उड़ा दिए गए थे जिन पर फ्रांस के शाहिद अगस्त   वेला का उद्धरण लिखा था,  कि "बहरों के कानों को सुनने के लिए बम के धमाकों की जरूरत पड़ती है,"। जब उन्हें पकड़ा गया तब तक वो नारे लगा रहे थे, इंकलाब जिंदाबाद...।

7 अक्टोबर 1930 को सांडर्स की हत्या के आरोप में भगतसिंह को फांसी की सजा सुनाई गई।साथ में सुख देव राजगुरु को भी इसी केस और लाहौर कांड के लिए फांसी की सजा सुनाई गई, जबकि दत्त को आजीवन कारावास के लिए काला पानी भेज दिया गया। फांसी की तिथि 24 मार्च 1931 तय की गई, लेकिन भयाक्रांत अंग्रेजों ने तीनों को 23 मार्च की रात को ही फांसी दे कर लाशों को टुकड़े कर के सतलुज नदी में बहा दिए। बाद में उनके अवशेषों का अंतिम संस्कार फिरोजपुर के पास सतलुज नदी के किनारे हुसैनीवाला में किया गया और समाधि बना दी गई।

यह स्थान भारत पाक सीमा पर है। यहां राष्ट्रीय स्मारक है।भगत सिंह की अंतिम इच्छा थी कि वो अपनी पसंद की पुस्तक लेनिन की "स्टेट एंड रिवोल्यूशन,"पढ़ना चाहते है। बांटें समय तक उसे ही पढ़ते रहे। शहीद आजम भगत सिंह ने अलौकिक बलिदान दिया। सत्ता और सरकार के   बहरे पन के विरुद्ध राष्ट्र प्रेमियों को आज भी भगतसिंह  प्रेरित करते हैं। इंकलाब जिंदाबाद,!!!