हाल हकीकत : ऐसी कैसी जन सुनवाई, मिली केवल लोगों को रुसवाई

हाल हकीकत : ऐसी कैसी जन सुनवाई, मिली केवल लोगों को रुसवाई

कलेक्टर का डेढ़ घंटे तक करते रहे इंतजार

⚫ 12:30 बजे तक दिए केवल 15 आवेदन

⚫ जिम्मेदार अधिकारियों की रुचि नहीं समस्या सुनने में

⚫ 20 मिनट में खत्म हो गई आम जनों की भीड़

हरमुद्दा
रतलाम, 25 नवंबर। एक पखवाड़े में दूसरी बार जनसुनवाई में आमजन को केवल रुसवाई मिली। कलेक्टर मिशा सिंह के आने का इंतजार करते रहे, मगर वह नहीं आई। खास बात तो यह है कि जिन लोगों को जिम्मेदारी दी गई थी, उनकी भी आम जन की समस्या सुनने में रुचि नजर नहीं आई। जिम्मेदारों के चेहरे से ऐसा लग रहा था कि उनकी थाली की रोटी मांग ली हो।

कलेक्टर कार्यालय के सभागार में मंगलवार को हुई जनसुनवाई में कलेक्टर सिंह, एडीएम का 12:30 बजे तक आम जन इंतजार करते रहे। इस समय तक बाहर केवल 15 आवेदन पत्र ही बाहर टेबल पर दर्ज हुए। समस्या सुनाने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। घड़ी के कांटे एक बजाने की ओर अग्रसर थे। फिर ताबड़तोड़ डिप्टी कलेक्टर राधा महंत को आवेदन देते रहे और बाहर रजिस्टर में संख्या बढ़ती रही। मगर इनकी भी रुचि समस्या को जानने और समझने और सुलझाने में नहीं नजर नहीं आई। कभी मोबाइल पर बात चलती रही तो कभी चेहरे पर हाथ रखे हुए नजर आई। 

डिप्टी कलेक्टर महंत

जावरा से ही होगा समस्या का समाधान

जावरा से आए धर्मेंद्र सिंह बताया कि आर्थिक सहायता के लिए वहां पर आवेदन दिया था मगर सुनवाई नहीं हुई। इसलिए कलेक्टर मैडम के पास देने आए हैं। मैडम है नहीं। अंदर से मैडम ने बोला कि जावरा में ही समस्या का समाधान होगा। 

जब वे झल्लाएआवेदक पर

डिप्टी कलेक्टर शर्मा

जनसुनवाई में 12:50 पर डिप्टी कलेक्टर संजय शर्मा आए। उनके पास एक आवेदक ने आकर बोला टीआई सुनते नहीं है, तो श्री शर्मा ने आवेदक पर झल्लाते हुए कहा तो एसपी के पास जाइए, यहां पर क्यों आए हो? 

देखते ही देखते भीड़ खत्म

टेबल पर आवेदनों की एंट्री कर रिसिप्ट बनाते हुए

जब समस्या लेकर आए आवेदकों को पता चल गया कि आवेदन लेने की केवल रस्म अदायगी हो रही तो कई सारे आवेदक चले गए। इधर बाहर रजिस्टर में एंट्री करने वाले की टेबल पर भीड़ बढ़ती रही। देखते ही देखते आंकड़ा 74 पर पहुंच गया। विभागों के प्रतिनिधि और जिम्मेदार अधिकारी भी निकल गए। अन्य आवेदकों का कहना था कि जब अधीनस्थ जिम्मेदारों से कुछ होता नहीं है तो उन्हें क्यों बिठाते हैं? ऐसा लगता है कि इन जिम्मेदारों को कुछ आता ही नहीं है।