धर्म संस्कृति : घर की शांति के लिए बेटी और बहु में अंतर मत करो 

धर्म संस्कृति : घर की शांति के लिए बेटी और बहु में अंतर मत करो 

डॉ. संयमलता म सा ने कहा

निलेश बाफना
रतलाम, 4 अगस्त। सास जो कभी बेटी थी वह आज माँ है और बहु जो कभी बेटी थी वह भी कभी माँ बनेगी। सास बहू का रिश्ता जन्मजात नही होता है, बनाया जाता है, यह रिश्ता केवल मानव जाति में पाया जाता है। कँही कंही  सास देवीका और बहु चंडिका है, कँही सास कठोर और कँही बहु नरम कभी, और कँही कँही तो राम मिलाय जोड़ी दोनों ही गरम दल से । सास और बहू दोनों ही देवी स्वरूप हो ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है।  जिस गलती के सासू माँ को माफ कर दिया जाए तो उसी गलती के लिये बहु को भी तो माफ किया जा सकता है।

यह विचार नीमचौक जैन स्थानक पर जैन दिवाकरीय महासती डॉ. संयमलता म सा ने धर्मसभा मे व्यक्त किए। आपने कहा की जो पुराने जमाने की सास होती थी वो बहु को दबाकर रखती थी घर का सारा हाथों से करवाती थी, लेकिन अब जमाना बदल गया है अब सास सुबह जल्दी उठ जाती है घर का सारा बासी काम कर देती है, और बहु देर तक सोती रहती है, सास बहु से डरती है और घर में शांति चाहती है, इसलिये  घर के सब काम करती है । घर मे शान्ति कायम रखना है तो चार बाते याद रखना बेटी और बहु में अंतर मत करना, बहु को इतना प्रेम देना की  वो अपना मायके का नम्बर भूल जाए।  

धर्म ध्यान भी करते और कलह भी

आज की युवा पीढ़ी धर्म से दूर हो रही है क्योंकि वो देखते है कि घर के बडे धर्म ध्यान करते है लेकिन घर में कलह करते है। आपका ऐसा स्वभाव और व्यवहार देखकर उनका धर्म पर विश्वास नही रह पाता है , बहु के सामने उसके पीहर की निन्दा मत करना, बहु अपने पीहर वालों की निन्दा कभी बर्दाश्त नही कर सकती है।  बहु की निन्दा मन्दिर, स्थानक, उपाश्रयों, पडोसी और रिश्तेदार से मत करना क्योंकि ये बात बहु को पता चलेगी तो सुलह के रास्ते बंद हो जाते है। आपकी दो या अधिक बहुए है और आप जिस बहु के पास रहती हो बाहर उसकी निंदा नही सदैव प्रसंशा करो । जो गिफ्ट अपनी बेटी के देते हो वैसा ही गिफ्ट बहु को भी दो, बहु बीमार हो जाए तो उसकी केयर करे डाक्टर को बताए ताकि सास भी जब बिमार पडेगी तो बहु सास की अच्छे से सेवा करेगी। ससुरजी को भी चाहिये कि हमेशा सास का पक्ष मत लेना सास बहु दोनों की बात सुनकर फैसला लेना। एक घर में एक ही आदेश चलना चाहिए और जँहा तक हो सके आदेश बड़ो का ही होना चाहिये, जिस घर में छोटों का आदेश चलता हो या एक से ज्यादा आदेश चलते है उस घर में शांति नही रह सकती है। सास कौशल्या के समान और बहू सीता के समान होना चाहिए। तो घर में ही स्वर्ग निश्चित है।  पुत्रवधू मत बनिये कुलवधु बनो। पुत्रवधु शादी के बाद पति को लेकर अलग हो जाएगी कुलवधु हमेशा कुल के साथ रहती है, सास ससुर के साथ रहती है। बहु रानी मत लाना क्योंकि वो कार तो लाएगी लेकिन अपनी सरकार चलाएगी और घर को स्वर्ग नही घर वालों को जीते जी स्वर्गीय बना देगी, बहु लाओगे तो वो संस्कार लाएगी औए घर को स्वर्ग बना देगी । अतः बहु रानी नही बहु लाना।  

विरोध में आए बहुत से पत्र

पूज्याश्री डॉ. संयमलताजी म.सा. ने शेरे राजस्थान रूपचंद जी मसा की 100वीं जन्म जयंती के अवसर पर कहा की राजस्थान के पाली जोधपूर मारवाड़ बहुत धार्मिक क्षेत्र है। पाली के नाडोल गाँव मे माता मोतियाबाई और पिता भेरूलाल जी के यँहा  बालक का जन्म हुआ।  माता पिता के संस्कार से वह दिन दुगनी रात चौगनी तरक्की करने लगा। बचपन में ही गुरुदेव मोतीलालजी म.सा. ने कहा की  इस बालक को हमे सौंप दो यह जिनशासन का नाम रोशन करेगा। माता पिता ने सहर्ष बालक को जिनशासन को सौंप दिया और नाम रखा गया रूपचंद जी म.सा., वे इतने निडर थे कि शमसान में घनघोर रात्रि में जाकर साधना करते थे। 108 गौशालाएं आपकी प्रेरणा से खुली जो आज भी चल रही है । राजस्थान के बाद उन्होंने दक्षिण भारत में विचरण किया वँहा के छोटे छोटे गाँवो में भी विचरण किया। 36 कौम के लोग उनके भक्त थे ।  हजारों लोग उनके दर्शन करने जाते और भोजन करते, चक्रवर्ती की भोजन शाला  के समान उनकी भोजनशाला चौवीसों घण्टे चलती थी। वे वचन सिद्धि के धनी तब । ये मेरा सौभाग्य है कि रूपचंद जी मसा के मुखारविंद से मेरी दिक्षा हुई। मेरी दीक्षा का बहुत विरोध था, विरोध में बहुत पत्र आए लेकिन वे दृढ़ थे और मुझे दिक्षा प्रदान कर मेरे ऊपर अनुकम्पा की ।