धर्म संस्कृति : सन्त खुद तपते है और अपना सबकुछ दुनिया को दे देते है
⚫ महासती डॉ. संयमलता मसा ने कहा
⚫ आपके सत्कर्म आपको राम, कृष्ण ओर महावीर बना सकते है : महासती डॉ. अमितप्रज्ञा
नीलेश बाफना
रतलाम, 19 जुलाई। सूर्य तपता है और तप तप को दुनिया को ऊर्जा और रोशनी देता और चंद्रमा स्वंय शीतल रहता है और दुनिया को शीतलता और चाँदनी प्रदान करता है। वैसे ही सन्त खुद तपते है और अपना सबकुछ दुनिया को दे देते है। ऐसे ही एक महान संत महाराष्ट्र भूषण मालवी केसरी पूज्य गुरुदेव श्री सौभाग्यमलजी म.सा. थे जिनका 41वाँ पुण्य दिवस आज हम मना रहे है ।

यह विचार जैन स्थानक नीमचौक पर आयोजित आराधनामय चातुर्मास की प्रवचन सृंखला के अंतर्गत व्यक्त किए । पूज्याश्री डॉ. संयमलता जी म.सा. ने फरमाया की पूज्य गुरुदेव का जन्म नीमच के पास सर्वनिया गाँव में फाफरिया परिवार में हुआ, आपकी माता का नाम केसर बाई और पिता चौथमल जी थे। पूज्य गुरुदेव श्री दिवाकर जी के कई संयोग आपके मिले जैसे जन्म स्थान नीमच के पास, दोनों की माता का नाम केसर बाई, आपके पिता का नाम चौथमलजी और दिवाकर जी का स्वंय का नाम चौथमल जी। माता ने बहुत अच्छे संस्कार दिए, बच्चे की पहली पाठशाला ही माँ होती है। आपका नाम रखा गया सौभाग्य। आपने चंहु और सौभाग्य फैलाया। महापुरुषों के जीवन में कष्ट आते ही है, लेकिन कष्ट में भी उनपर ईश्वर की विशेष कृपा रहती है। बचपन में ही आपके माता पिता का निधन हो गया। लेकिन उन्हें पालने वाले पालनहार भी मिल गए। बचपन में एक सन्त ने उन्हें देखते ही कह दिया कि यह बालक बहुत विद्वान बनेगा। नन्दलाल जी म.सा. ने आपको दिक्षा दी और सौभाग्य का नाम सौभाग्यमलजी म.सा. हो गया।
पुज्य महासतिया जी ने फरमाया की आपने ज्ञान दर्शन चारित्र की सुंदरतम आराधना की। महाराष्ट्र में महाराष्ट्र विभूषण का पद पाया। सन्त जँहा जँहा जाते है वँहा सोना ही सोना हो जाता है और सन्त जँहा से चले जाते है वँहा सुना सुना हो जाता है। आपने श्रमण संघ की एकता के लिये अनेक प्रयास किये, कभी पद की लालसा नही रखी। जीवन में गुरु केवल एक और सेवा अनेक का पालन करना चाहिए। जीवन में गुरु कभी नही बदलना चाहिए। संत कभी छोटा या बड़ा नही होता है, सन्त केवल सन्त होता है। जिसने अपना सबकुछ त्याग दिया वो क्या छोटा क्या बड़ा ।
धर्मसभा को पूज्या श्री डॉ. अमितप्रज्ञा जी मसा ने फरमाया की कर्म ही जन्म के साथ आते है और मृत्यु के साथ जाते है। बाकी न तो कुछ साथ आता है न ही साथ जाता है। आपके सत्कर्म आपको राम कृष्ण और महावीर बना सकते है और आपके ही दुष्कर्म आपको कंस और दुर्योधन बना सकते है। कर्म क्या है? आपकी क्रिया या आपका एक्शन ही आपका कर्म है। इस जन्म में भले ही मिले न मिले परभव में मिलता है, अपने अपने कर्मो का सबको फल मिलता है। आज तक किसी को किसी के पीछे जान देते हुए नही देखा, आज तक किसी की अर्थी के पीछे तिजोरी जाती हुई नही दिखी, आज तक किसी की चिता के साथ दुकान मकान की रजिस्ट्री नही गई। सिकन्दर ने पूरी दुनिया जीत ली लेकिन जब दुनिया से गया तो उसके दोनों हाथ खाली थे। आत्मा ही कर्ता है और आत्मा ही भोक्ता है, आप किसी से डरो न डरो कर्म के आगे तो घुटने टेकने ही पड़ेंगे।
सच्चा जैनी वो ही है जो जन्म से जैन है, बल्कि सच्चा जैनी वो है जो प्रभु महावीर के सिद्धान्तों पर गहरी आस्था रखता हो और उसका पालन करता हो। हमारी क्रिया ऐसी होना चाहिए कि कर्मो का बंधन न हो। महावीर की मोक्षगामी आत्मा को भी अपने कर्मो का भोगना पड़ा, 27 भव करने पड़े । भले ही ज्योतिष ने राम के राज्याभिषेक का मुहूर्त दे दिया, लेकिन कर्मसत्ता के कारण वो वनवास का मुहूर्त बन गया। प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को भी कर्मफल के कारण 12 महीने तक आहार नही मिला जबकि उन्होंने तो अनजाने में केवल 12 घड़ी के लिये बैल के मुंह पर कपड़ा बाँधा था। मतलब कर्म जानबुझ कर करो या अनजाने में किये गए कर्म का फल तो भुगतना ही पड़ेगा। वचन और काया से भले कोई व्यक्ति कोई बुरे कर्म न करे लेकिन बुरे विचारों से गलत भावनाओं भी कर्म का बन्ध हो जाता है।
350 श्रावक श्राविकाओं ने एकासन की तपस्या की
श्री वर्धमान स्थानककवासी जैन श्रावक संघ मीडिया प्रभारी नीलेश बाफना ने बताया की बताया की महासतिया जी के सान्निध्य में शुक्रवार को श्री पार्श्व पद्मावती एकासन मे लगभग 350 श्रावक श्राविकाओं ने एकासन की तपस्या की । इस अवसर पर पूज्य महासती डॉ. कमलप्रज्ञा जी ने सभी आराधको को एकासन की विधि संपन्न करवाई । एकासन का सम्पूर्ण लाभ प्रदीप कुमार राहुल कुमार पोखरना परिवार ने लिया। और एकासन करने वाले 350 तपस्वीयों को थाली सेट की प्रभावना महिला मंडल राजकुमारी पोखरना द्वारा भेंट की गई। पूज्य महासतिया जी का आराधनामय चातुर्मास जप, तप, त्याग ओर आराधना के माध्यम से बहुत ही हर्षोल्लास पूर्वक चल रहा है ।
Hemant Bhatt