विचार सरोकार : जब चले जाएंगे हम, लौट कर सावन की तरह...
⚫ 19 जुलाई को पुण्य तिथि है प्रेम और प्रेम त्रासदी के बेजोड़ कवि नीरज का
⚫ डॉ. प्रदीपसिंह राव
"शोहरत "की बुलंदियों तक पहुंचने वाले नीरज की 19 जुलाई को पुण्य तिथि है। सात सावन बीत गए उन्हें गए, लेकिन सावन की एक एक बूंद की तरह उनकी यादें खनकती है, कोई यू ही नीरज नहीं बन जाता है, अनेक झंझावातों संघर्षों को अपनी गीतमाला में पिरोकर सुरों की साधना से लाखों श्रोताओं का दिल जीतने वाले नीरज जब 6 वर्ष के थे, तब पिता गुजर गए।

इटावा में चाचा के पास रहकर स्कूली शिक्षा ली, लेकिन उन्होंने चोरी की झूठी शंका में उन्हें घर से निकाल दिया। पचास के दशक में जीवन व्यापन के लिए एक कचहरी में टाइपिस्ट का काम किया, फिर एक टॉकीज मे पान बीड़ी बेची। रिक्शा चलाया, यमुना नदी से सिक्के खोजकर निकाले। ट्यूशन पढ़ाई, फिर पढ़ते हुए प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते गए। एक दिन मेरठ कॉलेज में प्रोफेसर हो गए।
रोमांस के झूठे आरोप में गई नौकरी
किस्मत खराब थी। रोमांस के एक झूठे आरोप में उनकी नौकरी छूट गई। फिर एक सरकारी नौकरी मिली, वो भी वहां के भ्रष्टाचार सहन न होने पर छोड़ दी। अलीगढ़ में एक बार फिर हिंदी के प्रोफेसर बने। वे 1944-45 से ही गीत लिखते और कवि सम्मेलनों में मंच लूटने लगे थे। उनकी कविताओं ने फिल्म में और किस्मत ने उन्हें गीतकार का अवसर दिया।
गीतों की दुनिया में हो गए रातों-रात प्रसिद्ध
वे मुंबई चले गए 1964-65में फिल्म "नई उमर की नई फसल "में उनका लिखा गीत, कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे। इस गीत से वो रातों रात प्रसिद्ध हो गए। देखती ही रहो आज दर्पण में तुम, शोखियों में घोला जाए, रंगीला रे, बस यही अपराध मै हर बार करता हूं, जैसे अनेक कालजयी गीतों की रचना से वे गीतों के बादशाह बन गए। तीन तीन फिल्म फेयर, पद्मश्री, पद्मभूषण से अलंकृत नीरज जिस मंच पर जाते दिल जीत लेते। वे पीड़ा, प्रेम, श्रृंगार और विरह गीतों के माहिर हो गए।उसके लिए उन्होंने आजीवन दिल पर वेदना, उपेक्षा के घाव झेले, विवाह सफल न हुआ दो बार प्रेम टूटा। इसी लिए वे मंच से गाया करते थे,"इतने बदनाम हुए है हम तो इस ज़माने में, तुमको सदियां लग जाएंगी हमें भुलाने में,,।"
याद आएंगे हम प्रथम बार के चुंबन की तरह

नीरज का अंतिम पड़ाव बेहद्व उदासी और रुग्णता में बीता। अंत तक एक युवा सेवादार "सिंग सिंग" ने जीवन के अंतिम 17 वर्षों तक उनको सेवा, उपचार और लाचारी, निराशा से बचाया। एक गीत ऋषि नीरज जो पहले "भावुक इटावा" के नाम से कविता पढ़ते थे नीरज,(जल से जन्मा, कमल) विख्यात बन गया। उनकी अंतरात्मा से रचित दिल को छूती रचना "खुशी जिसने खोजी वो धन लेकर लौटा। हंसी जिसने खोजी वो चमन ले कर लौटा, मगर प्यार को खोजने जो गया वो, न धन ले के लौटा, न मन ले के लौटा! "नीरज को सावन की सुरभित हवाओं में स्मरण करें, जो लिख गए। "जब चले जाएंगे हम लौट के सावन की तरह, याद आएंगे हम प्रथम प्यार के चुंबन की तरह!"
अधूरापन ही उनकी शोहरत की पूर्णता
महाकाव्य रचते हुए चूक गए थे कविराज गोपालदास नीरज!जय शंकर प्रसाद के प्रसिद्ध महाकाव्य "कामायनी " की तरह, अलीगढ़ में रहते हुए कुछ वर्षों तक "शांतिलोक" महाकाव्य रच रहे थे, लेकिन प्रेम त्रासदियों, अशांति और शारीरिक मानसिक अवसाद के कारण यह ऐतिहासिक रचना अधूरी रह गई। नीरज का अधूरापन ही उनकी शोहरत की पूर्णता थी।

Hemant Bhatt