साहित्य सरोकार : "गर्मियों के दिन, कि जैसे बिच्छुओं के डंक"

साहित्य सरोकार : "गर्मियों के दिन, कि जैसे बिच्छुओं के डंक"

प्रोफेसर अज़हर हाशमी

हर तरफ़ फैला हुआ है सूर्य का आतंक,
गर्मियों के दिन, कि जैसे बिच्छुओं के डंक

कूलरों का कर्म है शंका के घेरे में,
लू-लपट ही घूमती है, हर तरफ़ नि:शंक 
कोप से, सूरज के बच जाएगा राजा, पर-
क्या करेगा वह बेचारा, जिसको कहते रंक ?

नूर सा गायब हुआ है, नीर नदियों का, 
झील झरनों में बचा है पंक, केवल पंक
गर्मियों को " फ़ेल" करके, "लू" की कापी में,
बाप रे ! सूरज ने पूरे दे दिए हैं अंक

⚫ प्रोफेसर अज़हर हाशमी

("अपना ही गणतंत्र है बंधु" से आभार)