धर्म संस्कृति : हिंसा से कभी सुख शांति प्राप्त नहीं होती

धर्म संस्कृति : हिंसा से कभी सुख शांति प्राप्त नहीं होती

साध्वी डॉ. संयमलताजी मसा ने कहा

⚫ बाल संस्कार शिविर का आयोजन हुआ

नीलेश बाफना
रतलाम, 20 जुलाई ।  नीमचौक श्री संघ में विराजित श्रमण संघीय जैन दिवाकरिया महासाध्वी डॉ. संयमलताजी म. सा., डॉ. अमितप्रज्ञाजी म. सा., डॉ. कमलप्रज्ञाजी म. सा.,  सौरभप्रज्ञाजी म. सा. आदि ठाणा 4 के सान्निध्य में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए महासती संयमलता ने कहा अहिंसा विश्व शांति का मूल आधार है। अहिंसा का सिद्धांत विश्व बंधुत्व की भावना को धारण करता है और संसार में व्याप्त युद्ध की विभीषिका को दूर करने में भी यह सिद्धांत अद्वितीय है। अहिंसा धर्म वीरों का भूषण है,कायरों का नहीं। अहिंसा का मार्ग आत्मज्ञान है। संपूर्ण जगत से प्रेम करने, मैत्री रखने और अहिंसा का पालन करने में ही आत्मा का कल्याण है।

साध्वी ने आगे कहा  महावीर जिसे अहिंसा कहते हैं, बुद्ध उसे करुणा और ईसा उसे प्रेम कहते हैं। यह तीनों एक दूसरे के पूरक है। सभी बुराइयों का त्याग अहिंसा है।अहिंसा अमृत है। आत्मोत्थान में अहिंसा अग्रणी है। अहिंसा जैन धर्म का प्राण है। 

महासाध्वी कमलप्रज्ञा ने कहा प्रेम जीवन का महामंत्र है, ये वो मन्त्र है जो पूरी दुनिया को अपने वश में करने की ताकत रखता है।प्रेम और मोह में अंतर है। प्रेम जीवन का प्रकाश है और मोह जीवन का अंधकार है। प्रेम उत्थान की राह है  और मोह पतन का मार्ग है। दुख का ऊपरी छिलका उतारकर देखेंगे तो मुख्य कारण मोह है। जो मोह का क्षय करता है उसे मोक्ष मिलता है।

प्रवचन के प्रारम्भ में सामूहिक रूप से दिवाकर चालीसा का गान हुआ। कन्या मण्डल द्वारा सती अंजना पर आधारित सुन्दर सी नाटिका का मंचन हुआ। रविवार को दोपहर में बाल संस्कार शिविर का आयोजन हुआ जिसमे 150 बच्चों ने भाग लिया।