... ये कैसी ट्रेन जो करवाती मैराथन
⚫ विडंबना यह है कि नहीं हो रहा समाधान
⚫ बुजुर्ग, दिव्यांग, महिला बच्चे यात्रियों के साथ होती है खासी दिक्कत
⚫ कर सकते हैं ऐसी सुविधा यहां पर भी
रतलाम, 9 अक्टूबर। इंदौर जाने के लिए सुबह-सुबह प्लेटफार्म नंबर एक पर ट्रेन रहती है जबकि इसके ऑपोजिट दो नंबर पर मंदसौर की तरफ जाने वाली। विडंबना यह है कि इंदौर जाने वालों के लिए तो दौड़ लगाने की सिवाय कोई चारा नहीं बचता। वही अनजान व्यक्ति इंदौर जाने वाली ट्रेन की बजाय मंदसौर जाने वाली ट्रेन में बहुत ज्यादा जगह दिखने के चक्कर में से बैठ जाता है। आखिरी वक्त पर जब पता चलता है कि यह ट्रेन मंदसौर जाएगी, इंदौर वाली तो आगे खड़ी है, फिर शुरू हो जाती है उसकी भाग दौड़, ताकि इंदौर की ट्रेन पकड़ सके। ऐसा कई लोगों के साथ होता है, कई सालों से हो रहा है। विडंबना बनाई है कि आज तक कोई समाधान नहीं निकला।

सुबह सुबह यदि आप रतलाम से इंदौर की यात्रा के लिए निकल रहे हैं, तो 6.35 को चलने वाली ट्रेन के लिए सुबह 4.30 पर निकलना होता है। क्यों कि ट्रेन नंबर 79310 को समय से पकड़ना है। मगर जो व्यक्ति किसी अन्य ट्रेन से रतलाम आता है और उसे इंदौर जाना होता है तो फिर भारी मुसीबत का सामना करना पड़ता है। कई यात्रियों की ट्रेन छूट जाती है।
टिकट के लिए फिर लंबी लाइन
टिकिट की लंबी लाईन में लगना है तो दो घंटे पहले पहुंचना होता है। यहां भी यह परेशानी होती है कि चार खिड़की की बजाय दो पर ही टिकट मिलते है। इसमें भी टिकट देने वाले फुर्ती से टिकट नहीं देते। सुबह-सुबह खुले पैसे को लेकर झिग झिग करते हैं।
अब शुरू होती है महा दिक्कत
टिकट मिल भी गया तो टिकट विंडो वाला जितने रुपए दे उससे ही संतुष्ट होकर निकलना पड़ता है। अब प्लेटफॉर्म तीन से सीढ़ियां चढ़ते हुए नंबर दो पर पहुंचना। इसे पार करते हुए प्लेटफार्म नंबर एक पर पहुंचने के लिए कमर कसकर दौड़ लगानी होती है या तेज चलना होता है ऐसे में साथ में सामान और बच्चे हो तो फिर तो क्या कहें।
चलित सीढ़ी की भी सुविधा नहीं
कोइ चलित सीढ़ी नहीं है। लिफ्ट में इंतजार करो, सब आ नहीं पाते, टिकिट घर से वो भी दूर ही। साइकिल, स्कूटर स्टैंड से लेकर गंतव्य, प्लेटफॉर्म नंबर एक के अंतिम छोर तक पहुंचने तक एक किलोमीटर से अधिक की मशक्कत हो जाती है।
उन सबके लिए काफी दिक्कत
यदि यह दूरी घटा भी दें, तो भी जो वृद्ध, महिला, बच्चे या आंशिक दिव्यांग, घुटने पैर की तकलीफ से जूझ रहे वयस्क, वरिष्ठ यात्रियों के लिए इस मैराथन प्लेटफॉर्म पर अंतिम छोर पर खड़ी ट्रेन को पकड़ना और जगह पाना बेहद मुश्किल होता है।
यह भी विडंबना
चलो जैसे तैसे करके प्लेटफार्म नंबर दो पर पहुंच भी गए तो विडंबना यह कि उसी प्लेटफार्म पर बाद में चलने वाली एक ट्रेन पहले से ठीक सीढ़ियों के पास खड़ी रहती है। भ्रम में खाली देख इंदौर के यात्री उसमें बैठ जाते हैं।उन्हें कोई बताए उसके पहले यदि वास्तविक दूर खड़ी ट्रेन चल दे। तो पकड़ पाना और दूभर।
रेलवे कई सुविधा इसके लिए गिना सकता है, लेकिन जिसे यह अनुभव लेना है वो खुद इस ट्रेन को सफर के लिए पकड़े।
हो सकता ऐसा भी
रेलवे इस मैराथन प्लेटफॉर्म वाली ट्रेन के लिए बैटरी कार ही चालू करवा दें। लोग शुल्क भी दे देंगे। कई जंक्शनों में ये सुविधा है तो इस अति महत्वपूर्ण जंक्शन पर क्यों नहीं? रतलाम इंदौर के लिए यह ट्रेन बेहद महत्वपूर्ण है।
⚫ डॉ. प्रदीपसिंह राव, पूर्व वरिष्ठ स्टेशन सलाहकार समिति, रतलाम
Hemant Bhatt