शख्सियत : महिला स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान क्यों भुला दिया गया?

शख्सियत : महिला स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान क्यों भुला दिया गया?

कवयित्री डॉ. उषा मिश्रा का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़
 
’आजादी की लड़ाई में महिलाओं ने पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया था, लेकिन आजादी मिलने के बाद उनके योगदान को भुला दिया गया। पुरूष स्वतंत्रता सेनानियों के चर्चे खूब होते हैं, लेकिन स्वतंत्रता सेनानी महिलाओं का जिक्र नहीं के बराबर होता है।’


 यह बात वरिष्ठ लेखिका डॉ. उषा मिश्रा ने कही। इनका मानना है कि स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं ने भी बढ़ चढ़कर भाग लिया था। उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध से लेकर क्रांतिकारी गतिविधियों तक, विभिन्न भूमिकाओं शिरकत की, लेकिन आजादी का इतिहास लिखते समय चंद महिलाओं का ही जिक्र होता है। इतिहास लेखन के क्षेत्र में भी पुरूषों का वर्चस्व है। यह अत्यंत चिंताजनक है।

नारी मुक्ति अभियान पश्चिम से प्रेरित

एक सवाल के जवाब में उषा जी ने कहा कि नारी मुक्ति अभियान ने पश्चिमी देशों की नारियों को बहुत हद तक बेड़ियों से मुक्त कर स्वतंत्र किया है, लेकिन विकासशील और पिछड़े देशों में ऐसा अभी तक नहीं हो पाया है। तमाम प्रगति के बावजूद यहां का स्त्री समाज अभी भी पिछड़ा हुआ और दमित है। हालांकि पश्चिमी देशों के स्त्री मुक्ति अभियान, शिक्षा के प्रसार आदि ने संघर्ष की अग्नि यहां भी प्रज्वलित कर दी है। भारत का नारी मुक्ति अभियान पश्चिमी देशों के नारी मुक्ति अभियान से प्रेरित और प्रभावित है।

आजादी की लड़ाई में लाखों महिलाओं ने भाग लिया

उषा जी का कहना है कि भारत में उन्नीसवीं सदी तक आते-आते नारियों की स्थिति बहुत दयनीय हो चुकी थी। समाज का विकास अवरूध्द हो चुका था। ऐसे में जंग -ए-आजादी चल रही थी। इतिहास गवाह है कि आजादी की लड़ाई में हजारों लाखों महिलाओं ने अपनी भूमिका बखूबी अदा की, भले ही इतिहास ने उन्हें दरकिनार कर दिया हो। इस सामूहिक प्रयास ने नारी चेतना को भी जागृत किया । नारी मुक्ति आंदोलन 19 वीं शताब्दी से छिटपुट रूप से शुरू हो गए थे। देश में नारियों के अनेक संगठन हैं, जहां स्त्री विमर्श होता है, लेकिन अभी भी हालत पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। महिला जागृति को लेकर महिलाओं को ही आगे आना होगा।

डॉ. मिश्रा की अनेक पुस्तकें प्रकाशित

डॉ. उषा मिश्रा श्रीमती एम.एम.पी. शाह महिला महाविद्यालय माटुंगा, मुम्बई से सेवानिवृत्त प्रोफसर हैं। इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं जिनमें रघुवीर सहाय का काव्य चिंतन एवं शिल्प, प्रदीर्घ कविता और कुआनो नदी, हिंदी के विशिष्ट कवि और उनकी कविताएं शामिल हैं, इनके अलावा  आलोचनात्मक पुस्तक तथा सृजनात्मक कविता संकलन भी शीघ्र छपने जा रहा है। आप हिंदी, मराठी और अंग्रेजी भाषाओं में पारंगत हैं। एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय मुंबई में शोध निर्देशक भी आप रही हैं। धर्मवीर भारती और उनका कथा साहित्य, वर्तमान सृजन संदर्भ और डॉ. शिवशंकर पांडेय, कसौटी पर कथा, समकालीन परिदृश्य में स्त्री लेखन, महाविद्यालय पत्रिका ’वागीश्वरी’, महाविद्यालय शोध पत्रिका ’कॉन्सेप्ट’ का आपने संपादन किया है।

अनेक रेडियो वार्ताओं का प्रसारण

रेडियों वार्ताओं के प्रसारण के साथ ही राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों की आप संयोजक रही हैं, अनेक कार्यशालाओं का आपने आयोजन किया है, विभिन्न संगोष्ठियों में प्रपत्रों का वाचन किया है। रिलायंस कंपनी मोबाइल में  2003-2005 तक विषय विशेषज्ञ रही हैं। महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की समन्वयक भी 2015-2023 तक रही हैं। आपको अनेक सम्मान तथा अंलकरण प्राप्त हो चुके हैं जिनमें महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी व्दारा आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी स्वर्ण सम्मान 2022-2023, साहित्य मंडल नाथव्दारा व्दारा सन् 2024 में ’हिंदी भाषा शिरोमणि’ सम्मान उल्लेखनीय हैं।

डॉ. मिश्रा की कविताएं

विस्थापन

यह जो आदमियों की भीड़ है
भूगोल को झूूठलाती
सीमाओं को लांघती 
कुचले जाने के बाद भी
पैरों से नापती जा रही है जमीन
दर-दर भटकती,
आज यहां तो कल कहीं और
क्या इसे ही विस्थापन कहते हैं ?
या अपने अर्थ से निकल कर
अब इसका विस्तार हो रहा है?
या अर्थ संकुचन के दौर से गुजरते हुए
परिभाषाओं से परे होते जा रहा है ?
खंगालता है अपने आप को
कि आखिर
दोनों ही रूपों में
कौन है इसका दाता?
देशों का युद्ध हो
या नदियों की सिकुड़न
युद्ध ,सीमा के अन्दर का हो
या सीमा पार।
लोग स्थापित कर दिए जाते हैं
विस्थापित होने के लिए
क्यों होता है ऐसा?
राजा बनाकर
हि प्रजा भी नही रह पाते।
नंबरों की गिनती में तो कम मानव हैं
पर मौत में पशु भी नहीं।
स्थापित होते-होते 
विस्थापन की पीड़ा झेलने में
गुजर जाती है तमाम 
राहें ,तमाम रातें
और सिकुड़ता अतित्व 
प्रश्नचिंह लिए 
बाट जोहता रहता है 
जिंदगी की।

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मेरी कोख में

तुम पुरवैया की बयार हो,
वसंत की महकती अमराई हो
वर्षा की सोंधी खुशबू हो
ताप में भी गुलमोहर-सी 
फैली लाली हो 
फिजा को अपना लेने वाली
तुम उर्वरा हो, शक्ति हो
सृष्टि में सर्वोच्च हो
तुम से ही सृष्टि का अस्तित्व है
तुम से ही बनता उसका व्यक्तित्व है
पर, बिटिया मेरी कोख में
कभी मत आना
क्योंकि मेरी कोख से 
बाहर निकलते ही
असुरक्षित जाल के ताने-बाने में
जकड़ उठोगी 
कारण कोई एक हो तो बताऊं
निशिचर दिवसचर जो हो गए हैं
कानून से भी लंबी इनकी 
पकड़ जो हो गई है
संविधान से भी ऊपर 
इनका ओहदा हो गया है
पाताल तले भी इनका 
गुप्त तहखाना है
धरा का हर कोना इनकी 
गिरफ्त में है
कोई भी जगह तुम्हारे लिए
सुरक्षित नहीं है 
घर हो या बाहर 
सबकी निगाहों में कैद रहोगी
इसलिए तुम किसी भी 
लोक में जन्मों
मुझे अधूरा ही रहने देना
पर बिटिया मेरी कोख में
कभी मत आना 
मत आना कभी भी मेरी कोख में।