शख़्सियत : पंजाबी रचनाकारों के योगदान को किया जाना चाहिए स्वीकार
हमारे प्रदेश की मिट्टी त्याग, तपस्या और बलिदान की भावना से अनुप्राणित रही है, जिसके प्रभाव से पंजाबी साहित्य किसी न किसी रूप में प्रभावित रहा है। यहां धर्म, न्याय और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अनेक महान शूरवीरों और गुरुओं ने बलिदान दिया।
⚫ कवयित्री अरतिंदर संधू का कहना
⚫ नरेंद्र गौड़
’’अनेक पंजाबी रचनाकारों ने अपनी कविता, गीत, ग़ज़ल कहानी, उपन्यास और नाटकों के जरिए भारतीय साहित्य को समृध्द किया है। यह बात भारतीय भाषा के लेखकों को याद रखना चाहिए।’’

प्रतिष्ठित पंजाबी कवयित्री अरतिंदर संधू ने यह बात कही। इन्होंने बताया कि हमारे प्रदेश की मिट्टी त्याग, तपस्या और बलिदान की भावना से अनुप्राणित रही है, जिसके प्रभाव से पंजाबी साहित्य किसी न किसी रूप में प्रभावित रहा है। यहां धर्म, न्याय और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अनेक महान शूरवीरों और गुरुओं ने बलिदान दिया। इनमें मुग़लकाल में गुरु तेग बहादुर जी, गुरु गोविंदसिंह जी के चार पुत्र, बाबा बंदासिंह बहादुर जी, भाई मतीदास जी, भाई दयाल जी, भाई तारूसिंह जी, भाई मनीसिंह जी, बाबा दीपसिंह जी, बोतासिंह और भाई गरजासिंह जी आदि शामिल हैं। वहीं मुग़लों के खिलाफ चमकौर साहिब की लड़ाई जैसी घटनाओं और इन शहीदों के बलिदान ने पंजाब में सिख संघर्ष और खालसा पंथ की नींव को अमर कर दिया।
पंजाबी कविता की शुरुआत
अरतिंदर जी ने बताया कि ’ग्रंथ साहब’ में चैदह अन्य धर्मों के भक्तों की वाणी भी शामिल है। गुरूनानक ऐसे रचनाकार थे जिनकी लिखी कविता को रवींद्रनाथ टैगोर ने ’यूनिवर्सल सांग’ कहा था। पंजाबी साहित्य को समृध्द बनाने में सूफी संतों, गुरुओं और आधुनिक लेखकों ने अहम योगदान दिया है। गुरु नानक देव जी से पंजाबी कविता की शुरूआत मानी जाती है।
सूफी कवि बुल्ले शाह
अरतिंदर जी ने बताया कि सूफी कवि बुल्लेशाह, सुल्तान बाहू जैसे पंजाबी सूफी कवियों ने प्रेम, आध्यात्म और मानवता का संदेश दिया। बुल्ले शाह पंजाबी के सबसे बड़े सूफी कवि और दार्शनिक रहे हैं जिनकी काफ़ियां आज भी लोकप्रिय हैं। आधुनिक पंजाबी साहित्य का जनक भाई वीरसिंह को माना जाता है। उन्होंने सिख इतिहास, दर्शन और आध्यात्म पर आधारित उपन्यास और अनेक कविताओं की रचना की। बारहवीं शताब्दी में शेख फरीद की रचनाएं आज की पंजाबी के बहुत नजदीक है। इतना सभी इसलिए कह रही हूं कि किसी भी भाषा के साहित्य का मूल्यांकन उसकी परंपरा से काटकर नहीं किया जा सकता। इसीलिए इन बातों का यहां ज़िक्र जरूरी है।
कविता की रानी अमृता जी
एक सवाल के जवाब में अरतिंदर जी ने बताया कि अगर पंजाबी ’कविता की रानी’ का खिताब किसी को नवाजा जाए तो यह श्रेय अमृता प्रीतम (1919-2005) को दिया जाता है। उन्होंने महिला अधिकारों, सामाजिक मुद्दों और देश के विभाजन की त्रासदी को लेकर ’पिंजर’ और ’सत्तों बहिना’ जैसी रचनाओं के जरिए भारतीय साहित्य को समृध्द बनाया। वे साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाली पहली महिला लेखिका थी। यदि उपन्यास की बात करें तो गुरुदयाल सिंह पंजाबी के प्रख्यात उपन्यासकार और कथाकार रहे हैं। इस योगदान के लिए उन्हें सर्वोच्च सम्मान ’भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित किया जा चुका है। इसी प्रकार हरभजन सिंह ने अपनी कविताओं और आलोचनात्मक लेखन के जरिए पंजाबी काव्य शैली को नया रूप दिया है।
आधुनिक पंजाबी साहित्य
अरतिंदर जी ने बताया कि यदि आधुनिक पंजाबी साहित्य की बात की जाए तो अवतारसिंह संधु (पाश) और लालसिंह दिल का नाम आदर से लिया जाता है। इन्होंने प्रगतिशील और जनवादी कविता को नई धार दी वहीं श्रमिकों के जीवन संघर्षों को पहचाना और सामाजिक यथार्थ को शब्दों में पिरोया। इनके अलावा राजेंद्र सिंह बेदी, फै़ज़ अहमद फ़ैज़, सआदत हसन मंटो, भीष्म साहनी, गुरमुख सिंह मुसाफिर, इंतिजार हुसैन, प्रभजोत कोर, आगा हश्र कश्मीरी, अनूप विर्क, इमरोज इस तरह पंजाबी हिंदी रचनाकारों की फैहरिस्त बहुत लम्बी है।
सोलह कविता संकलन प्रकाशित
अरतिंदर संधू जी का नाम पंजाबी की प्रतिष्ठत लेखिकाओं मेें शुमार है। आपके सोलह कविता संकलन प्रकाशित हो चुके हैैं। इनमें सिजदे जुगनूआँ नू, सपंदन, इक्क टोटा वरेस, एकम दी फाँक, किण मिण अखर, शीशे दी जून, किधों आउँदी कविता, कदे कटाई, घर घर, आपणे तों आपणे तक, कदे ताँ मिल जिंदगी, विचला मौसम, घर घर ते घर, मिट्टी दी गौरव गाथा, मन दा मौसम, बिसात शामिल हैं। एक गद्य पुस्तक ’जड़ां दे विच विचाले’ भी चर्चित हुई है। इन्होंने हिंदी कवियों की कविताओं के पंजाबी में अनुवाद भी किए हैं, जो ’खंभड़ियाँ’ संकलन में संग्रहित है। मनोज शर्मा दियाँ चैणवीं कविता, मन दा पंछी और ’कुआरनटाईन ते होर कहानियाँ’ तथा ’प्रो. हूबनाथ पांडे दी चोणवीं कविता’ इनकी अन्य अनूदित पुस्तकें हैं। हाल ही में इनकी हिंदी भाषा में लिखी कविताओं का संकलन ’तपस्वी होते हैं काँटे’ सुधि पाठकों बहुत सराहा गया है।
पुस्तकों का संपादन
अरतिंदर जी ने पाकिस्तानी कहानियों, किसानी कविताओं तथा ’मिट्टी दे वणजारे’ संकलन का संपादन किया है। आप ’एकम’ नाम की पत्रिका का वर्षों से संपादन कर रही हैं और इसी नाम से साहित्य संथा की संचालक हैं। उल्लेखनीय है कि यह संस्था साहित्यिक गतिविधियों के आयोजन के साथ ही प्रतिवर्ष दो कवियों की कविताओं के पहले संकलन को पुरस्कृत करती है। अरतिंदर जी के दो पंजाबी कविता संकलन का अनुवाद हिंदी में हो चुका है। इनकी काव्यकर्म पर पांच आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हैं। अमृतसर जिले के एक गांव में सरदार जरनैल सिंह और श्रीमती तेजपाल कौर के घर जन्मी अरतिंदर जी पंजाबी साहित्य में एमए कर चुकी हैं और शासकीय हायर सेंकेंडरी विद्यालय में प्राचार्य रही हैं। इन दिनों अमृतसर में रहती हैं।
अरतिंदर जी कविताएँ
समय
सुना था
समय गुजर जाता है
पर समझा तब
जब सारा समय
मेरे बीच से गुजरा।
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कविता
कविता!
मेरी बेटी हो तुम ?
मचलती मेरे भावों के साथ
चलती मेरी साँसों के
गलियारों के बीचों- बीच सदा
लिपट- लिपट जाती
लपेट लेती कभी मुझे
तू मेरी सखी हो !
हाथ पकड़ कर
मेरे अकेलेपन का
घुमा ले आती मुझे
मेरे अंतर्मन के
रास्तों के अँधेरों में से
छू देती ज़ख्मों को
सहलाती, चुन- चुन कर
मेरी पीड़ाओं को
माँ हो मेरी तुम ?
जोड़ती रहती
मेरी साँसों के धागों की
हरेक टूटती लड़ी को
पीछा करती मेरा
खंडहरों वीरानों में
शब्दों के कलावे में लपेट
मेरी भड़क रही सोचों को
लगा लेती सीने से
कविता! तुम पिता हो मेरे ?
जीने की तीखी धूपें
थलों की कँटीली ख़ामोशियाँ
ग़मों की जोरदार बाढ़ों
और मुझे बहा ले जाने आए
तूफ़ानों में मेरा हाथ पकड़
बचा ले जाती सदा
तुम महबूब हो मेरे ?
सदियों तरसाना
अचानक आ जाना
सामने बैठाना
भुला देने गिले शिकवे सारे
तुम ? मैं ही तो नहीं कहीं
मेरे दोफाड़पन का एक फाड़
गुम जाती मेरे ही अंदर कहीं
और ढूँढती फिरती तुम्हें
जंगल बेलों में मैं
अपनी ही महक को
तेरा होना मेरा होना
अहसास भर जीना
और पूछते रहना कविता !
क्या हो मेरी तुम ?
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बंदे का वास्तु
वास्तु वाले कहते
टूटे किनारों वाले
कप प्लेटें
मत इस्तेमाल करो
और सँभालो भी मत
पुराने उधड़े, फटे हुए
या मरम्मत किये गये कपड़े
पहनो, ना रखो ही घर में
बंदा ऐसे कर भी ले
पर अपने आप का क्या करें?
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कर्म विकास के बाद
कई करोड़ वर्ष पहले
जिंदगी फूटी थी धरती पर
चढ़ने लगी, वर्ग दर वर्ग
क्रम विकास की पौड़ी
वर्गों की परतों में से गुजरते
मछली, मेंढक, गिरगिट, मगरमच्छ
और पक्षी के रूप में से
निकलते हुए
आदमी घड़ लिया जिंदगी ने
हरेक वर्ग के जीव
ऊपर वाले वर्ग में जाने समय
छोड़ देते रहे
पिछली जाति की कुछ आदतें
जैसे बड़ी मछली
खा जाती थी छोटी मछली को
पर ऊपर के जलथली जीव
यानी मेढ़क वर्ग बनने पर
मेंढकों ने छोड़ दिया
छोटे मेंढकों को खाना
आगे बढ़ते हुए
कर्म विकास पर
रेंगने वाले जीवों ने छोड़ दी
मेंढकों की तरह
अपने होने के बारे में
टर्र टर्र करने की आदत
गिरगिट थे उस वर्ग में
बदल लेते रंग अपना
जरूरत के मुताबिक
मगरमच्छ थे
निगल जाते किसी को
झूठे आँसू बहाते हुए
विकास की अगली सीढ़ी पर
बने पंखों वाले जीव
पक्षी बन कर
छोड़ दिये उन्होंने
रंग बदलने और बहाते रहना
झूठ मूठ के आंसू
वह उड़ने लगे
और बहुत फुर्तीले
होशियार बन गये
इस के बाद
विकसित हुआ बंदा
वो और भी होशियार
समझदार, खबरदार
और परतदार हो गया
सारे के सारे वर्गों की
सारी ही सँभाली, अपनाईं
और छोड़ी हुई आदतें
बुहारी, उठाई उस ने
और सँभाल ली अंदर अपने।

Hemant Bhatt