करोड़ों की संपत्ति, फिर भी पाई-पाई को मोहताज: रतलाम के 145 वर्ष पुराने ऐतिहासिक 'रानी जी के मंदिर' की उपेक्षा पर उठे सवाल

करोड़ों की संपत्ति, फिर भी पाई-पाई को मोहताज: रतलाम के 145 वर्ष पुराने ऐतिहासिक 'रानी जी के मंदिर' की उपेक्षा पर उठे सवाल

⚫​ ऐतिहासिक गौरव और राष्ट्रीय महत्व का केंद्र

⚫​ महात्मा गांधी द्वारा सराहना

⚫​ अरबों की जमीन, पर आय शून्य: अव्यवस्था का पूरा लेखा-जोखा

5 वर्षों से बंद मानदेय और उत्सव राशि

हरमुद्दा
​रतलाम, 21 अगस्त। शहर के मध्य स्थित अति प्राचीन एवं ऐतिहासिक 'श्री अजब कुंज बिहारी मंदिर' (जिसे आमजन 'रानी जी का मंदिर' के नाम से जानते हैं) वर्तमान में प्रशासनिक अनदेखी और बदहाली का शिकार है। अरबों रुपये की परिसंपत्तियों और मासिक किराए की आय के बावजूद मंदिर के पुजारी विगत 5 वर्षों से अपने मानदेय और धार्मिक आयोजनों के लिए राशि को तरस रहे हैं।


​ऐतिहासिक गौरव और राष्ट्रीय महत्व का केंद्र

मंदिर के पुजारी वासुदेव चतुर्वेदी और धर्म समाज एवं पुजारी संघ के पूर्व प्रदेश महामंत्री पंडित हरीनारायण चतुर्वेदी ने बताया कि यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था बल्कि राष्ट्रीय इतिहास का भी साक्षी रहा है। इसकी पुरानी पारंपरिक बनावट और नक्काशी शहर के पुराने इतिहास की याद दिलाती है

​स्थापना व निर्माण

145 वर्ष पूर्व तत्कालीन राजा भैरव सिंह जी की पत्नी महारानी अजब कुंवर बाई ने अपने निजी खर्च से लाल पत्थरों से इसका निर्माण कराकर राधा-कृष्ण जी की मूर्ति स्थापित की थी।इसकी पुरानी पारंपरिक बनावट और नक्काशी शहर के पुराने इतिहास की याद दिलाती है।

इसे रामानुज संप्रदाय के महंत ओंकार दास जी को समर्पित किया था।

​ऐतिहासिक क्षण

वर्ष 1945 में तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन यहाँ दर्शन करने आए थे।

​महात्मा गांधी द्वारा सराहना

वर्ष 1947 में तत्कालीन महाराजा लोकेंद्र सिंह जी ने महात्मा गांधी के अछूतोद्धार कार्यक्रम के तहत इसी मंदिर में हरिजन प्रवेश कराया था। पर्यावरण भी खुशहाल सिंह पुरोहित के अनुसार 3 सितंबर 1931 को जमनालाल बजाज के नेतृत्व में मंदिर में हरिजन प्रवेश का आयोजन हुआ था। जिसकी प्रशंसा स्वयं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आकाशवाणी के माध्यम से की थी। उल्लेखनीय है कि श्री बजाज का ससुराल जावरा में ही था। उनकी श्रीमती जानकी देवी का जन्म जावरा में ही मारवाड़ी परिवार में हुआ था। इसलिए उनका आना-जाना रहता था और गांधी जी ने हरिजन प्रवेश के अभियान में उनको ही रतलाम का कार्य सौपा था।

​अरबों की जमीन, पर आय शून्य: अव्यवस्था का पूरा लेखा-जोखा

​कौड़ियों के भाव गई जमीन: मंदिर की 210 बीघा कृषि भूमि विरियाखेड़ी में स्थित थी, जिसे पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के कार्यकाल में रतलाम विकास प्राधिकरण (पूर्व नगर सुधार न्यास) द्वारा बेहद कम दामों पर अधिग्रहित कर लिया गया। वर्तमान में इस भूमि पर डोंगरे नगर, शासकीय वाणिज्य महाविद्यालय, वृद्धाश्रम और बाल सम्प्रेषण गृह बने हुए हैं। इसके अलावा 14 बीघा अन्य कृषि भूमि भी शेष है।

आधा अरब से अधिक की भूमि पर अवैध कब्जा

करमदी रोड पर सर्वे नंबर 901 व 902 की लगभग 16 बीघा सिंचित कृषि भूमि (जिसकी वर्तमान बाजार कीमत 50 करोड़ रुपये से अधिक है) पिछले 70 वर्षों से माली के कब्जे में है। वहां पक्के निर्माण हो चुके हैं, लेकिन प्रशासन मौन साधे बैठा है। 

​मासिक किराया और भेदभाव

मंदिर के चारों तरफ बनी दुकानों से प्रति माह ₹42,000 का किराया आता है। इस मंदिर की कमाई का उपयोग अन्य मंदिरों की व्यवस्थाओं के लिए किया जा रहा है, लेकिन स्वयं इस मंदिर के पुजारी मानदेय के लिए तरस रहे हैं।

​5 वर्षों से बंद मानदेय और उत्सव राशि

वर्तमान में मंदिर की चतुर्थ पीढ़ी के रूप में महंत वासुदेव जी और पंडित हरीनारायण चतुर्वेदी व्यवस्था संभाल रहे हैं। पूर्व में तहसीलदारों द्वारा श्री कृष्ण जन्माष्टमी जैसे प्रमुख त्यौहारों के लिए राशि स्वीकृत की जाती थी। परंतु, पिछले 5 वर्षों से वर्तमान व पूर्व तहसीलदारों द्वारा धार्मिक उत्सवों और पुजारियों के मानदेय के लिए एक भी रुपया जारी नहीं किया गया है। ​इस संबंध में वर्तमान तहसीलदार कुलभूषण शर्मा को पत्र सौंपा गया है तथा जिला कलेक्टर से इस गंभीर मामले में तत्काल हस्तक्षेप कर मंदिर की जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराने और बकाया राशि जारी करने की मांग की गई है।