साहित्य सरोकार : चाल बदलते चरित्रों को बेनकाब करती है कहानी
⚫ साहित्यकार प्रो. रतन चौहान ने कहा
⚫ जनवादी लेखक संघ द्वारा साहित्यकार आशीष दशोत्तर कहानी 'गिंडोले' पर चर्चा आयोजित
हरमुद्दा
रतलाम, 26 मई। कहानी समाज का प्रतिबिंब होती है । कहानी के पात्र समाज के ही चरित्र होते हैं मगर यह सब सार्वभौमिक होता है। कोई भी चरित्र कई स्थानों पर महसूस किया जा सकता है । 'गिंडोले' कहानी ऐसे दोगले चरित्र वाले लोगों को बेनकाब करती है जो समय आने पर अपनी चाल बदलते रहते हैं । यह कहानी इस दौर में बहुत महत्व रखती है क्योंकि यह हमारे बीच के ही कई चरित्रों को सामने लाती है।

उक्त विचार वरिष्ठ रचनाकार प्रो. रतन चौहान ने जनवादी लेखक संघ द्वारा युवा कथाकार आशीष दशोत्तर की पुरस्कृत कहानी 'गिंडोले' पर आयोजित चर्चा गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किए । उन्होंने कहा कि समाज का सच ऐसी कहानियां ही सामने लाती हैं । यह कहानी दोगले चरित्रों के विचार परिवर्तन को रेखांकित करती कहानी भी है। हर इंसान को यह तय करना ज़रूरी होता है कि वह कहां और किसके साथ खड़ा है। ऐसे में दो नावों पर सवार होकर चलने वाले लोगों पर तंज़ करती यह कहानी अपनी बात बहुत प्रभावी ढंग से कहती है।
ताकतों को उजागर करती कहानी
वरिष्ठ रंगकर्मी कैलाश व्यास ने कहा कि इस कहानी में कबीर का चरित्र उभर कर सामने आता है । हमारे समाज के साझापन और उसे विभक्त करने वाली ताकतों को यह कहानी उजागर करती है। उन्होंने कहा कि कोई भी कहानी तभी प्रभावी बनती है जब उसका चरित्र कथाकार के साथ निरंतर चलता रहे । इस कहानी में कहीं ऐसा प्रतीत नहीं होता कि कथाकार अपने मार्ग से अलग हुआ हो । यह कहानी कथाकार के सोच और समाज के प्रति दृष्टिकोण को भी अभिव्यक्त करती है।
समाज की विसंगतियों को सामने लाने की जरूरत
कथाकार इंदु सिन्हा ने कहा कि यह कहानी हमारे सांस्कृतिक ताने-बाने पर चिंता जताते है और ऐसे लोगों को सामने लाती है जो इसे तोड़ने पर आमादा हैं । उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रतीकों के माध्यम से समाज की अन्य विसंगतियों को भी सामने लाने की ज़रूरत है।
हमारे साथ सफर करती है कहानियां
वरिष्ठ शिक्षाविद डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने कहा कि इस कहानी के भीतर कई सारी कहानियां हमारे साथ सफर करती हैं । हमारे सामाजिक संस्कार, पारिवारिक वातावरण और व्यक्तिगत व्यवहार सभी कुछ इस कहानी के माध्यम से समझे जा सकते हैं।
घटनाएं गंभीर बातें रहती है प्रतिकों के माध्यम से
वरिष्ठ शायर और जलेसं सचिव सिद्धीक़ रतलामी ने कहा कि इस कहानी का किरदार और घटनाएं प्रतीकों माध्यम से काफ़ी गंभीर बातें कहती है। यहां कोई घटना सिर्फ़ चरित्र ही नहीं है बल्कि हमारे समाज का वह विद्रूप चेहरा है जो हर कहीं मौजूद है । ऐसे चरित्रों को पहचानने की तरफ कहानी इशारा करती है।
मुख्य किरदार हमारे बीच का ही
जलेसं अध्यक्ष रणजीत सिंह राठौर ने अपने आलेख में कहा कि यह कहानी ऐसी प्रतीत होती है , जैसे इसका मुख्य किरदार हमारे बीच का ही है । यही कहानी की सफलता है। श्रीमती आशा श्रीवास्तव ने कहानी को समाज सापेक्ष निरूपित किया। इतिहासविद नरेंद्र सिंह पंवार ने कहानी के तत्वों के माध्यम से इस रचना की व्याख्या करते हुए कहा कि यह कहानी किसी भी दृष्टि से कमतर नज़र नहीं आती है । यह अपनी बात कहने में पूरी तरह सफल रही है। विनोद झालानी ने कहानी के शीर्षक के आकर्षण और उसके भीतर मौजूद काव्य तत्व की विवेचना करते हुए मौजू विषय पर अपनी बात कही। दुर्गेश सुरोलिया ने कहा कि यह कहानी एक ऐसे चरित्र को उजागर करती है जिसका होना ही हमारे समाज के साझापन के लिए ज़रूरी है। मांगीलाल नागावत ने कहानी के कला पक्ष पर अपने विचार रखते हुए कहा कि कलात्मक दृष्टि से यह कहानी बहुत प्रभावित करती है। संजय परसाई सरल ने कहा कि ऐसी कहानियों को आज सामने लाने की आवश्यकता है। रंगकर्मी श्याम सुंदर भाटी ने कहानी से संबंधित काव्य तत्व पर प्रकाश डाला। आई.एल. पुरोहित ने रचना को सारगर्भित निरूपित किया। शिवराज जोशी ने कहा कि यह कहानी प्रेरणा देती है। प्रारंभ में आशीष दशोत्तर ने कहानी 'गिंडोले' का पाठ कर अपना वक्तव्य दिया।
इनकी मौजूदगी रही
इस अवसर पर वरिष्ठ विचारक विष्णु बैरागी, सुरेन्द्र छाजेड़, सुभाष यादव, जयवंत गुप्ता, चरण सिंह पथिक, जवेरीलाल गोयल, कीर्ति शर्मा, चरण सिंह यादव, एस.के. मिश्रा, कला डामोर सहित सुधिजन मौजूद थे। गोष्ठी का संचालन कैलाश व्यास ने किया तथा आभार सिद्दीक़ रतलामी ने माना।
शशि भोगलेकर पर केंद्रित आयोजन 8 जून को
जनवादी लेखक संघ की श्रृंखला 'एक रचनाकार का रचना संसार' के तहत शहर के दिवंगत रचनाकार शशि भोगलेकर की रचनाओं पर केंद्रित आयोजन 8 जून रविवार को प्रातः 11 बजे भगत सिंह पुस्तकालय शहर सराय रतलाम पर किया जाएगा। इसमें शहर के सुधिजन स्व. शशि भोगलेकर की रचनाओं का पाठ कर चर्चा करेंगे।
Hemant Bhatt