कलेक्ट्रेट में बैठक: 'मिशन मुस्कान' की समीक्षा में सामने आई शिक्षा विभाग की सुस्ती
⚫ 66 हजार बच्चों की अपार आईडी बनना शेष
⚫ 1000 से ज्यादा एडमिशन अटके
⚫ रतलाम जिले में रिकॉर्ड स्तर पर सुस्ती छाई
⚫ इंफ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे पर भी भारी लापरवाही उजागर
हरमुद्दा
रतलाम, 4 जुलाई। बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लाने के उद्देश्य से शुरू किए गए 'मिशन मुस्कान' की कलेक्ट्रेट सभा कक्ष में हुई समीक्षा बैठक ने विभागीय दावों की पोल खोलकर रख दी है। जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) सुश्री सिमरन सूर्यवंशी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में जो आंकड़े सामने आए, वे जिले की लचर शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक ढिलाई को साफ बयां कर रहे हैं। सत्र शुरू होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी अब तक बच्चों का बुनियादी नामांकन और सरकारी कागजी औपचारिकताएं भी पूरी नहीं कर पाए हैं। रतलाम जिले में रिकॉर्ड स्तर पर सुस्ती छाई हुई हैं।

कलेक्टर मिशा सिंह ने कार्यक्रम के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग तथा स्कूल शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारियों को दायित्व सौंप दिए हैं।
दूरस्थ अंचलों का अंदाजा...
विभागीय लापरवाही का आलम यह है कि कक्षा पहली में शत-प्रतिशत नामांकन की समय सीमा 25 जुलाई 2026 तय की गई है, लेकिन वर्तमान स्थिति बेहद निराशाजनक है। समीक्षा में सामने आया कि जिले में कुल 1066 बच्चे अब भी स्कूल के दरवाजे से दूर हैं, यानी उनका नामांकन ही नहीं हो पाया है। इसमें सबसे खराब स्थिति बाजना ब्लॉक की है, जहां 636 बच्चे शिक्षा के अधिकार से वंचित हैं। वहीं, जिला मुख्यालय (रतलाम) में ही 309 बच्चों का एडमिशन पेंडिंग है। जब मुख्य केंद्रों की यह स्थिति है, तो दूरस्थ अंचलों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
कागजों में डिजिटल इंडिया: 66,000 बच्चों की 'अपार आईडी' पेंडिंग
एक तरफ जहां पूरे देश को डिजिटल और 'एक छात्र, एक पहचान' (अपार आईडी) से जोड़ने का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, वहीं रतलाम जिले में रिकॉर्ड स्तर पर सुस्ती छाई हुई है। बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक, जिले में अब भी 66,145 बच्चों की अपार आईडी बनना शेष है। अधिकारियों की इस सुस्ती के कारण इतनी बड़ी संख्या में छात्रों का भविष्य और उनका डिजिटल रिकॉर्ड अधर में लटका हुआ है।

इंफ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे पर भी भारी लापरवाही उजागर
इसके अलावा, इंफ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे पर भी भारी लापरवाही उजागर हुई है। को-लोकेशन सर्वे (Co-location Survey) के तहत कुल 2030 भवनों में से 738 भवनों की एंट्री अब तक सिस्टम में नहीं की जा सकी है। यह स्थिति तब है जब शिक्षा सत्र रफ्तार पकड़ चुका है।
स्कूलों में केवल नाम की हाजिरी, धरातल पर योजनाएं लापता
बैठक में 'ई-अटेंडेंस' की स्थिति 94% पाई गई, जिसे शत-प्रतिशत करने के निर्देश तो दिए गए, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि शेष 6% बच्चे और शिक्षक कब इस व्यवस्था से पूरी तरह जुड़ेंगे?
यही नहीं, स्कूलों में शिक्षा का माहौल सुधारने के लिए कागजों पर चलने वाली योजनाएं जैसे—रीडिंग कॉर्नर, जादुई पिटारा, जीरो पीरियड और लाइब्रेरी का अनिवार्य उपयोग अब तक केवल कड़े निर्देश देने तक ही सीमित है। अगर ये योजनाएं सुचारू रूप से चल रही होतीं, तो हर बैठक में इन्हें 'अनिवार्य रूप से सुनिश्चित करने' के निर्देश देने की नौबत नहीं आती।
तालमेल की कमी : महिला एवं बाल विकास विभाग भी सुस्त
शिक्षा विभाग के साथ-साथ महिला एवं बाल विकास विभाग के कामकाज पर भी बैठक में सवाल उठे। 3 से 6 वर्ष के बच्चों का 'पोषण ट्रैकर' पर शत-प्रतिशत रजिस्ट्रेशन न होना, 'विद्या आरंभ' के बच्चों की सूची स्कूलों से साझा करने में देरी और सबसे महत्वपूर्ण—पलायन (माइग्रेशन) करने वाले परिवारों और बच्चों का कोई पुख्ता रिकॉर्ड न होना यह दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर आंगनवाड़ी और स्कूलों के बीच का समन्वय (कोऑर्डिनेशन) पूरी तरह ध्वस्त है।
कंट्रोल रूम केवल निर्देशों में सिमटा
विभाग ने अपनी कमियों को छिपाने या शिकायतें सुनने के लिए कंट्रोल रूम का नंबर (07412297544) तो जारी किया है और इसका प्रचार करने को कहा है, लेकिन देखना यह होगा कि क्या इस नंबर पर आने वाली शिकायतों का निवारण भी उतनी ही तेजी से होगा जितनी तेजी से बैठक में 'निर्देश' बांटे गए हैं।
शिक्षा व्यवस्था का यह हाल गंभीर चिंता का विषय
बैठक में जिला परियोजना समन्वयक (DPC) राजपूत, महिला एवं बाल विकास विभाग की सहायक संचालक भारती डांगी समेत विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO), BRC, BAC और CDPO तो मौजूद रहे, लेकिन अधिकारियों की इस भारी-भरकम फौज की मौजूदगी के बाद भी जिले की शिक्षा व्यवस्था का यह हाल गंभीर चिंता का विषय है। अब देखना यह है कि 25 जुलाई की डेडलाइन तक ये कमियां दूर होती हैं या केवल आंकड़ों की बाजीगरी कर कागजी 'मुस्कान' बिखेरी जाएगी।
Hemant Bhatt