धर्म संस्कृति : शहर के प्राचीन श्री गढ़ कैलाश महादेव मंदिर में हुआ गलन्तिका बंधन
⚫ वैशाख की प्रतिपदा से शुरू होता है यह कार्य
⚫ शहर के कई शिवालय रहे वंचित
हरमुद्दा
रतलाम, 3 अप्रैल। शहर के प्राचीन श्री गढ़ कैलाश महादेव मंदिर में शुक्रवार को गलन्तिका बंधन का कार्य हुआ। शास्त्रोक्त मान्यता के अनुसार वैशाख की प्रतिपदा से यह कार्य शुरू होता है। शहर के कई शिवालय में यह कार्य नहीं हुआ। वही कई शिवालय ऐसे भी है जहां 12 महीने गलन्तिका लगी रहती है।

वैशाख मास की प्रतिपदा शुक्रवार को शहर के प्राचीन श्री गढ़ कैलाश मंदिर में पंडित सुशील उपाध्याय ने विधि विधान के अनुसार शिवलिंग पर गलन्तिका बंधन का कार्य किया। मटकी का पूजन अर्चन कर उसमें जल भरा गया। मटकी में नीचे छेद कर लच्छा बांधा गया ताकि बूंद बूंद जल शिव पर चला रहे।

गर्मी में शीतलता के लिए होता है गलन्तिका बन्धन

ज्योर्तिविद पंडित दुर्गाशंकर ओझा ने हरमुद्दा से चर्चा में बताया कि शिवालयों में गलन्तिका बंधन (शिवलिंग के ऊपर जल की मटकी या पात्र बांधना) मुख्य रूप से वैशाख के महीने में किया जाता है। शास्त्रोक्त मान्यता के अनुसार भगवान शिव को "आशुतोष" के साथ-साथ अत्यंत संवेदनशील भी माना जाता है, और उनके मस्तक पर चंद्रमा शीतलता का प्रतीक है। भीषण गर्मी से महादेव को शीतलता प्रदान करने के लिए भक्त उनके ऊपर जल की धारा प्रवाहित करते हैं।
तो कहीं निर्जला एकादशी एकादशी तक चलती है यह परंपरा
यह परंपरा सामान्यतः चैत्र पूर्णिमा के बाद, यानी वैशाख मास के पहले दिन से शुरू होती है। यह पूरे वैशाख मासक (अक्सर ज्येष्ठ मास की निर्जला एकादशी तक) चलती है। ज्योतिर्विद ओझा ने बताया कि मिट्टी के पात्र (कलश) में एक छोटा सा छेद करके उसमें कुशा, लच्छा या सूती धागा लगाया जाता है, जिससे बूंद-बूंद जल निरंतर शिवलिंग पर गिरता रहता है।
धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व शीतलता प्रदान करना
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, विषपान के कारण शिव के शरीर में जो दाह (गर्मी) उत्पन्न हुई थी, उसे शांत करने के लिए जल की धारा अर्पित की जाती है। "गलन्तिका" शब्द 'गलन' से बना है, जिसका अर्थ है बूंद-बूंद टपकना। यह निरंतर भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। वैशाख और ज्येष्ठ के महीनों में भारत में अत्यधिक गर्मी होती है, इसलिए मंदिरों में इस परंपरा का कड़ाई से पालन किया जाता है।
कई जगह नहीं हुआ गलन्तिका बंधन
शुक्रवार को जब हरमुद्दा ने शहर के विभिन्न शिवालयों में देखा तो कई जगह गलन्तिका बंधन नहीं हुआ। वहीं कई जगह पुरानी मटकी ही शिवलिंग पर लटकी हुई मिली। जिसमें जल भी नहीं था। शहर में कई शिवालय ऐसे भी है, जहां पर पूरे 12 महीने शिवलिंग पर मटकी से जल की बूंद बूंद गिरती रहती है।
Hemant Bhatt