सामाजिक सरोकार : पर्यावरण की रक्षा ही जीवन की सुरक्षा, इसे जनआंदोलन बनाना हर नागरिक का संकल्प

जब पेड़ों को बचाने के लिए अमृता देवी विश्नोई और उनकी तीन बेटियों सहित 363 लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी, तो वह विश्व इतिहास का सबसे अनूठा उदाहरण बन गया। जब हमारे पूर्वज पेड़ों के लिए जान दे सकते थे, तो क्या हम आज एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल भी नहीं कर सकते?"

सामाजिक सरोकार : पर्यावरण की रक्षा ही जीवन की सुरक्षा, इसे जनआंदोलन बनाना हर नागरिक का संकल्प

विचारक, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्व उप संचालक अभियोजन कैलाश व्यास ने कहा

⚫ विधि महाविद्यालय में ‘पर्यावरण सजगता’ कार्यक्रम का आयोजन

⚫ ​वरिष्ठ अधिवक्ता ने याद दिलाया अमृता देवी विश्नोई का ऐतिहासिक बलिदान

⚫ ​विद्यार्थियों और प्राध्यापकों ने लिया वर्षा ऋतु में पौधों को गोद लेने का संकल्प

हरमुद्दा
​रतलाम, 6 जुलाई। "पर्यावरण का संरक्षण केवल सरकारों की जिम्मेदारी या कागजी नियम नहीं है, बल्कि यह हमारे अपने प्राणों की रक्षा करने के समान है। यदि हम आज जल, जंगल और जमीन के अंधाधुंध दोहन को नहीं रोकेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य संकट में पड़ जाएगा। अब समय आ गया है कि पर्यावरण चेतना को हर घर तक पहुंचाकर एक बड़ा जनआंदोलन बनाया जाए।"


​यह विचार वरिष्ठ विचारक, अधिवक्ता एवं पूर्व उप संचालक अभियोजन कैलाश व्यास ने स्थानीय डॉ. के.एन.के. विधि महाविद्यालय रतलाम में आयोजित 'पर्यावरण सजगता' विषयक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए।

विचारक श्री व्यास का स्वागत करते हुए प्राचार्य तिवारी

संविधान और न्यायपालिका ने माना: 'स्वच्छ पर्यावरण ही जीवन का अधिकार'

कार्यक्रम का गरिमामय शुभारंभ मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. अनुराधा तिवारी ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि आज के दौर में प्रकृति को बचाना हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। ​मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए श्री व्यास ने विद्यार्थियों को कानूनी और संवैधानिक कड़ियों से जोड़ते हुए बताया कि भारतीय संविधान हर नागरिक को एक स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण में जीने का अधिकार देता है।

ऐतिहासिक फसलों के हवाले में रतलाम के अधिवक्ता वरदीचंद पोरवाल का जिक्र

उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हमारी न्यायपालिका ने हमेशा पर्यावरण सुरक्षा को इंसानी जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा माना है। इस दौरान उन्होंने रतलाम के ही वरिष्ठ अधिवक्ता वरदीचंद पोरवाल द्वारा जनस्वास्थ्य के लिए लड़े गए उस ऐतिहासिक कानूनी मामले का भी जिक्र किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायों को नागरिकों के स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति सीधे तौर पर जवाबदेह ठहराया था।

खेजड़ली के बलिदान से सीख लेने की जरूरत

भाषण के दौरान श्री व्यास ने इतिहास के उस पन्ने को याद किया जिसने पूरे देश में पर्यावरण चेतना की नींव रखी थी। उन्होंने वर्ष 1730 में राजस्थान के खेजड़ली गांव में हुए ऐतिहासिक बलिदान का जिक्र करते हुए कहा:
​"जब पेड़ों को बचाने के लिए अमृता देवी विश्नोई और उनकी तीन बेटियों सहित 363 लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी, तो वह विश्व इतिहास का सबसे अनूठा उदाहरण बन गया। जब हमारे पूर्वज पेड़ों के लिए जान दे सकते थे, तो क्या हम आज एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल भी नहीं कर सकते?"

आज की सबसे बड़ी चुनौती वैश्विक जल संकट

उन्होंने यूरोप में चल रही भीषण हीट वेव और वैश्विक जल संकट का उदाहरण देते हुए आगाह किया कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं, बल्कि आज की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।
​केवल पौधारोपण नहीं, 'पौधों को बड़ा करने' का लिया संकल्प
​कार्यक्रम का सबसे सकारात्मक और प्रभावी मोड़ तब आया, जब मुख्य अतिथि के आह्वान पर महाविद्यालय के सभी प्राध्यापकों, स्टाफ और सैकड़ों छात्र-छात्राओं ने एक अनूठा संकल्प लिया। सभी ने तय किया कि इस वर्षा ऋतु में हर व्यक्ति कम से कम पांच-पांच पौधे लगाएगा और केवल औपचारिकता के लिए नहीं, बल्कि उन्हें पेड़ बनने तक गोद लेकर उनकी नियमित देखभाल करेगा।

यह थे मौजूद

​इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. जितेंद्र शर्मा, हरेंद्र प्रताप सिंह, अर्चना धाकड़, कोमल सिंह, रंजू शर्मा, अरविंद गोडाम, भूपेंद्र रामटेकेकर, प्रदीप पाठक, ऋतुबाला व्यास, सपना जैन सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं सजग श्रोता के रूप में उपस्थित रहे। संचालन अर्चना धाकड़ ने किया। आभार प्रदर्शन हरेंद्र सिंह राठौड़ द्वारा व्यक्त किया गया।