मुद्दे की बात : बदलते उज्जैन में मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार से जुड़ी 168 एकड़ जमीन खरीद पर सवाल

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के परिवार और संबंधित इकाइयों की जमीन खरीद का दस्तावेजी विवरण इंडियन एक्सप्रेस ने प्रकाशित किया है। मुद्दे की बात यह है कि सौदों की कीमत करीब 45 करोड़ रुपये बताई गई है। मामला जमीन खरीद के अधिकार का नहीं है। मुद्दा बदलते उज्जैन में सत्ता और निजी कारोबार के बीच पारदर्शिता का है।

मुद्दे की बात : बदलते उज्जैन में मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार से जुड़ी 168 एकड़ जमीन खरीद पर सवाल

हरमुद्दा
भोपाल,24 जून। उज्जैन में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के परिवार और संबंधित इकाइयों की जमीन खरीद को इंडियन एक्सप्रेस की दस्तावेजी पड़ताल ने सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। इसमें दावा किया गया है कि दिसंबर 2023 के बाद उज्जैन और आसपास कम से कम 137 प्लॉट खरीदे गए। इनका कुल क्षेत्रफल करीब 168 एकड़ है। सौदों की कीमत करीब 45 करोड़ रुपये बताई गई है।

समय-क्रम इस विवाद का अहम हिस्सा है। मई 2023 में उज्जैन मास्टर प्लान 2035 जारी हुआ। दिसंबर 2023 में डॉ. मोहन यादव मुख्यमंत्री बने। इसके बाद उज्जैन में कई सड़क और हाईवे परियोजनाएं घोषित या आगे बढ़ाई गईं। इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में 168 एकड़ में से करीब 111 एकड़ जमीन ऐसी परियोजनाओं के आसपास बताई गई है। यहीं यह विवाद सामान्य जमीन खरीद से आगे बढ़ता है। सवाल खरीद के अधिकार का नहीं है। सवाल यह है कि बदलते उज्जैन में सार्वजनिक पद और निजी कारोबार के बीच पारदर्शिता कितनी साफ दिखती है?

परिवार की ओर से दिया गया तर्क

डॉ. मोहन यादव का उज्जैन से पुराना राजनीतिक और प्रशासनिक संबंध रहा है। वे उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष रहे। मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम से जुड़े रहे। 2013 से उज्जैन दक्षिण से विधायक रहे। इसलिए उज्जैन की जमीन, सड़क और शहरी विस्तार से जुड़े सवाल सामान्य रियल एस्टेट खबर से आगे जाते हैं। सरकारी पक्ष भी इंडियन एक्सप्रेस ने दर्ज किया है। राज्य सरकार के अधिकारियों ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि विस्तारित परिवार की जमीन खरीद को सीधे मुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री कार्यालय से जोड़ना उचित नहीं होगा। परिवार की ओर से भी पुराने रियल एस्टेट कारोबार और निजी कारोबार करने के अधिकार का तर्क दिया गया है। यह पक्ष दर्ज होना चाहिए। लेकिन इससे सार्वजनिक जवाबदेही का सवाल समाप्त नहीं होता। सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के मामले में केवल वैधता पर्याप्त नहीं होती। पारदर्शिता भी दिखनी चाहिए। सवाल यही है कि उज्जैन में सत्ता, परिवार और निजी कारोबार के बीच दूरी कितनी स्पष्ट है।

जमीन खरीद का दायरा

इंडियन एक्सप्रेस के दस्तावेजी विवरण में जमीन खरीद का दायरा परिवार से आगे जाता है। इसमें पत्नी, बहू, भाई, बहन, भतीजे और चचेरे भाइयों से जुड़े नाम सामने आते हैं। कुछ खरीद सीधे नाम से बताई गई है। कुछ खरीद कंपनियों और फर्मों के जरिए बताई गई है।

इनका भी है उसमें उल्लेख

रिपोर्ट के अनुसार, श्री सिद्धिविनायक देवकॉन्स इस मामले में प्रमुख इकाइयों में से एक है। इसमें डॉ. मोहन यादव और उनकी पत्नी सीमा यादव की कुल 73 प्रतिशत हिस्सेदारी बताई गई है। पुत्र वैभव यादव कंपनी के निदेशक बताए गए हैं। श्री अन्नपूर्णा कंस्ट्रक्शन, श्री अन्नपूर्णा एंटरप्राइजेज, श्रीवेंकटेश देवबिल्ड एलएलपी, श्रेयांवी डेवलपर्स और मंगलमूर्ति इंफ्रा जैसी इकाइयों का भी उल्लेख है। इन नामों का महत्व केवल पारिवारिक संबंधों तक सीमित नहीं है। जमीन अलग-अलग नामों और इकाइयों से जुड़ी दिखती है। कुछ जमीन बाद में विकास समझौतों और हाउसिंग परियोजनाओं से भी जुड़ी। यही संरचना इस विवाद को सामान्य खरीद से अलग बनाती है।

तब भी थी इतनी जमीन

दस्तावेजी पड़ताल में कहा गया है कि मुख्यमंत्री बनने से पहले भी परिवार के पास कम से कम 108 प्लॉट और कुल 179 एकड़ जमीन थी। इनमें से 85 एकड़ जमीन 2021 से 2023 के बीच खरीदी गई, जब डॉ. यादव मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री थे। परिवार का जमीन और रियल एस्टेट से पुराना संबंध बताया गया है। लेकिन पुराना कारोबार सार्वजनिक जवाबदेही से छूट नहीं देता, खासकर जब मुख्यमंत्री बनने के बाद खरीद की गति और लोकेशन सवाल खड़े करती हो।

सड़क परियोजनाओं के आसपास जमीन

उज्जैन के आसपास जमीन की अहमियत केवल क्षेत्रफल से तय नहीं होती। वह सड़क, हाईवे, संपर्क मार्ग और भविष्य के शहरी विस्तार से भी तय होती है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, गंगेड़ी इसी भूगोल का बड़ा उदाहरण है। यह क्षेत्र उज्जैन-बड़नगर और उज्जैन-इंदौर हाईवे के जंक्शन के पास है। अप्रैल 2024 के बाद यहां 38 प्लॉट में कम से कम 51 एकड़ जमीन खरीदी गई बताई गई है। उन्हेल में नए उज्जैन-नागदा हाईवे के दोनों ओर कम से कम 29 एकड़ जमीन का उल्लेख है। कराड़िया-नवाखेड़ा, करोंदिया, जयवंतपुरा और चंदेसरा जैसे क्षेत्र भी इसी सिलसिले में आते हैं। इनकी अहमियत इसलिए बढ़ती है कि वे सड़क, संपर्क और भविष्य के शहरी विस्तार से जुड़े बताए गए हैं।

लोकतांत्रिक जवाबदेही में स्पष्टीकरण

ये तथ्य किसी अपराध को साबित नहीं करते। लेकिन वे जमीन खरीद और सरकारी विकास की दिशा के बीच एक पैटर्न दिखाते हैं। लोकतांत्रिक जवाबदेही में ऐसी निकटता स्पष्टीकरण की मांग करती है।

मास्टर प्लान और भूमि उपयोग

उज्जैन मास्टर प्लान 2035 को मई 2023 में जारी किया गया था। यह डॉ. मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने से पहले की बात है। इसलिए केवल मास्टर प्लान के आधार पर बाद की हर खरीद को सत्ता से जोड़ना सही नहीं होगा। लेकिन मास्टर प्लान शहर का भविष्य तय करता है। वह बताता है कि कौन-सा क्षेत्र आवासीय हो सकता है। कौन-सा क्षेत्र व्यावसायिक गतिविधि के लिए खुल सकता है। जमीन का बाजार ऐसे संकेतों को जल्दी समझता है।

अन्य हिस्सों में भूमि उपयोग बदलाव

दस्तावेजी पड़ताल में कहा गया है कि उज्जैन में जिन क्षेत्रों में भूमि उपयोग कृषि से आवासीय या व्यावसायिक दिशा में बदला गया, उनमें से कई जगहों पर यादव परिवार से जुड़ी जमीनें भी बताई गईं। इसका अर्थ यह है कि जिन इलाकों में भविष्य में कॉलोनी, बाजार या अन्य शहरी विकास की संभावना बढ़ सकती थी, वहां परिवार की जमीन मौजूद होने का दावा किया गया। सावराखेड़ी, नानाखेड़ा, डेढ़िया और पांड्याखेड़ी जैसे क्षेत्र इसी संदर्भ में सामने आते हैं। सावराखेड़ी का उदाहरण खास है। मास्टर प्लान जारी होने से कुछ सप्ताह पहले वहां कम से कम 30 एकड़ जमीन खरीदी गई बताई गई। विरोध के बाद जुलाई 2023 में सावराखेड़ी की लगभग 367 एकड़ जमीन को गैर-आवासीय उपयोग में वापस किया गया। लेकिन अन्य हिस्सों में भूमि उपयोग बदलाव जारी रहा। पांड्याखेड़ी में 18 एकड़ जमीन खरीद का उल्लेख है। यह क्षेत्र मास्टर प्लान में नए व्यावसायिक क्षेत्र के रूप में दर्ज बताया गया। ऐसे बदलाव जमीन की भावी कीमत और उपयोग पर असर डालते हैं। इसलिए भूमि उपयोग बदलाव इस रिपोर्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

जमीन से हाउसिंग प्रोजेक्ट तक

जमीन खरीद के बाद की गतिविधियां भी अहम हैं। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, गंगेड़ी में चचेरे भाई गोविंद यादव और सहयोगियों से जुड़ी जमीन बाद में इंदौर के शांति महालोक बिल्डर्स को विकास के लिए दी गई बताई गई। एक समझौते में विकसित संपत्ति का 67.8 प्रतिशत हिस्सा जमीन मालिक पक्ष को मिलने की बात दर्ज है। अन्य सौदों में 60:40 अनुपात बताया गया।

जमीन से प्रोजेक्ट तक की घड़ी

यह हिस्सा जमीन से प्रोजेक्ट तक की कड़ी दिखाता है। जमीन केवल खरीदी नहीं गई। कुछ मामलों में वह विकास समझौतों और हाउसिंग परियोजनाओं से भी जुड़ी है। निलेश यादव से जुड़े सावरिया ब्रांड का विवरण भी इसी दिशा में जाता है। श्री अन्नपूर्णा कंस्ट्रक्शन के जरिए अक्टूबर 2024 से नवंबर 2025 के बीच चार हाउसिंग योजनाएं मध्य प्रदेश आरईआरए में पंजीकृत बताई गईं। इनमें श्री सावरिया धाम, सावरिया ड्रीम्स, सावरिया ग्रीन और श्री सावरिया रेजिडेंसी शामिल हैं। यहां जमीन खरीद, विकास समझौते और हाउसिंग बाजार की कड़ी सामने आती है। यही कड़ी सार्वजनिक पद की जवाबदेही को और महत्वपूर्ण बनाती है।

सरकारी पक्ष और परिवार का जवाब

सरकारी पक्ष भी महत्वपूर्ण है। इंडियन एक्सप्रेस ने दर्ज किया है कि मुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री कार्यालय ने विस्तृत सवालों पर टिप्पणी नहीं की। राज्य सरकार के अधिकारियों ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि विस्तारित परिवार की जमीन खरीद को सीधे मुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री कार्यालय से जोड़ना उचित नहीं होगा। उनका कहना था कि परिवार लंबे समय से रियल एस्टेट कारोबार में है।

परिवार की ओर से गोविंद यादव के बेटे अनंत यादव का पक्ष दर्ज है। उन्होंने कहा कि उनका परिवार 2010 से रियल एस्टेट कारोबार में है। उनके अनुसार, परिवार को जमीन खरीदने, उसे विकसित करने और बेचने का अधिकार है। गंगेड़ी की जमीन को लेकर उनका कहना था कि समझौते 2020 से जुड़े थे, जब डॉ. यादव मंत्री भी नहीं थे। उनके अनुसार, संबंधित हाईवे का काम 2019 में मंजूर हुआ था और जमीन हाईवे पर नहीं, बल्कि करीब 100 मीटर दूर है। यह पक्ष रिपोर्ट का जरूरी हिस्सा है। परिवार के पुराने रियल एस्टेट कारोबार और जमीन खरीदने-बेचने के अधिकार का तर्क दर्ज होना चाहिए। लेकिन सार्वजनिक पद से जुड़े मामले में सवाल केवल निजी अधिकार तक सीमित नहीं रहता। वहां पारदर्शिता और दूरी भी दिखनी चाहिए।

सार्वजनिक विश्वास की परीक्षा

सार्वजनिक जीवन में हर सवाल अपराध से जुड़ा नहीं होता। कई बार सवाल भरोसे और पारदर्शिता का होता है। अगर किसी सार्वजनिक पद से जुड़े फैसलों के आसपास उसी परिवार का निजी कारोबार दिखाई दे, तो जवाबदेही का सवाल उठता है। यह अपने आप अपराध का प्रमाण नहीं होता, लेकिन सरकार से साफ और दस्तावेजी स्पष्टीकरण मांगता है।

अनाम सफाई पर्याप्त नहीं

उज्जैन मामले में यही निकटता सवाल बनती है। एक तरफ शहर का मास्टर प्लान, सड़क कॉरिडोर, भूमि उपयोग बदलाव और सिंहस्थ 2028 की तैयारी है। दूसरी तरफ उसी शहर में सत्ता से जुड़े परिवार की रियल एस्टेट गतिविधि है। ऐसे मामलों में सरकार पर स्पष्टीकरण का भार बढ़ जाता है। क्या मुख्यमंत्री कार्यालय ने हितों के टकराव से बचने की कोई व्यवस्था बताई? क्या उज्जैन से जुड़े निर्णयों में दूरी रखी गई? क्या मास्टर प्लान, सड़क परियोजनाओं, भूमि उपयोग बदलाव और अधिग्रहण से जुड़े दस्तावेज पूरी तरह सार्वजनिक हैं? इतने बड़े सार्वजनिक सवाल पर अनाम सफाई पर्याप्त नहीं है। जवाब आधिकारिक होना चाहिए। जवाब दस्तावेजों में होना चाहिए। नागरिकों को यह समझने का अधिकार है कि सरकारी निर्णयों और निजी कारोबार के बीच दूरी कैसे रखी गई। यह दूरी दस्तावेजों में भी दिखनी चाहिए।

दस्तावेजी खुलासे की तस्वीर

यह मामला किसी अपराध के निष्कर्ष का नहीं है। किसी अदालत या जांच एजेंसी ने दोष तय नहीं किया है। सरकारी पक्ष और परिवार का पक्ष भी मौजूद है। इसके बावजूद, इंडियन एक्सप्रेस के दस्तावेजी खुलासे से जो तस्वीर सामने आती है, उसे सामान्य रियल एस्टेट गतिविधि कहकर छोड़ना पर्याप्त नहीं होगा। इस विवाद का असली प्रश्न जमीन खरीद का नहीं है। प्रश्न सार्वजनिक पद और निजी कारोबार के बीच पारदर्शिता का है। जवाब आरोपों से नहीं आएगा। जवाब दस्तावेजों और पारदर्शिता से आएगा।

सीबीआई से होनी चाहिए समयबद्ध जांच

यदि आरोप इतने व्यापक और गंभीर हैं, तो उनकी सत्यता अथवा असत्यता का निर्धारण निष्पक्ष जांच से ही होना चाहिए। निश्चित तौर पर सीबीआई से समयबद्ध जांच कर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए। इससे न केवल संबंधित पक्षों को न्याय मिलेगा, बल्कि जनता का विश्वास शासन, जांच एजेंसियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं में भी सुदृढ़ होगा। प्रश्न आरोपों का नहीं, पारदर्शिता और जवाबदेही का है।
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