हाल हकीकत : रतलाम शहर का 'सिस्टम' धृतराष्ट्र, जनता भुगतने को मजबूर: चौड़े चौराहों पर विज्ञापनों और बैरिकेड्स का कब्ज़ा
यदि जल्द ही इन अव्यवस्थित चौकियों और बैरिकेड्स को हटाकर यातायात सुचारू नहीं किया गया और अवैध पार्किंग पर नकेल नहीं कसी गई, तो रतलाम की जनता का यह आक्रोश जल्द ही सड़कों पर प्रशासनिक असफलता का हिसाब मांगता नजर आएगा।
⚫ कैबिनेट मंत्री के शहर में ट्रैफिक व्यवस्था राम भरोसे
⚫ चौड़े चौराहों को पहले कर रहे सकरा, योजना बनाकर फिर करेंगे चौड़ा
⚫ चौराहों पर खड़े रहने वाले मैजिक, रिक्शा पर नियंत्रण नहीं
⚫ परेशान जन बोले तो भी शहर में चलने वाले मैजिक रिक्शा वालों को कोई असर नही
हरमुद्दा
रतलाम, 25 जुलाई। शहर के चौड़े और सुगम चौराहों को विकास का प्रतीक होना चाहिए था, लेकिन रतलाम में यही चौराहे आम जनता के लिए मुसीबत का सबब बन चुके हैं। नगर निगम और यातायात प्रशासन की नाकामी का आलम यह है कि चौराहों के ठीक बीचों-बीच विज्ञापन की चौकियां और बेतरतीब बैरिकेड्स लगाकर रास्तों को बेहद संकरा कर दिया गया है। नतीजा यह कि वाहन चालकों को मजबूरन गलत दिशा (रॉन्ग साइड) में गाड़ियां चलानी पड़ रही हैं। सवाल यह उठता है कि क्या जिम्मेदार अधिकारी इन विज्ञापनों से आने वाले राजस्व या निजी फ़ायदे के आगे आम जनता की जान-माल को गिरवी रख चुके हैं?

बैरिकेट्स लगाकर कर दिए चौराहे संकरा

इतनी कम जगह में चौकी से घूम कर कैसे निकले वाहन
मास्टर प्लान के नाम पर जनता का नुकसान, खुद की अक्ल पर ताला
एक तरफ तो प्रशासन शहर के विकास और चौराहों को चौड़ा करने का ढिंढोरा पीटता है, जिसके नाम पर कई बार आम नागरिकों और छोटे व्यापारियों का भारी नुकसान कर दिया जाता है। वहीं दूसरी तरफ, उन्हीं चौराहों के बीच में कमर्शियल बोर्ड और बेतुके बैरिकेड्स ठोंक दिए जाते हैं। संकरे हो चुके इन मोड़ों से एक समय में दो वाहन भी ठीक से नहीं गुजर पाते। समझ से परे है कि चौराहों को छोटा कर देने वाली इस 'अनोखी इंजीनियरिंग' के पीछे अफ़सरों की कौन सी अक्ल काम कर रही है!

चौराहे संकरे होने के बाद नियमों को तोड़कर ऐसे निकलती एम्बुलेंस
ई-रिक्शा, मैजिक और ऑटो का चौराहे पर डेरा, पुलिस मौन
समस्या सिर्फ बैरिकेड्स तक सीमित नहीं है। नगर सेवा की मैजिक गाड़ियां, ई-रिक्शा और ऑटो चालक बिना किसी खौफ़ के सीधे चौराहों के मुहाने पर ही गाड़ियां रोककर सवारियां उतारते और बिठाते हैं। घंटों चौराहे पर खड़े रहकर सवारी का इंतजार करना इनकी आदत बन चुकी है, जिससे पूरा ट्रैफिक ठप हो जाता है। शनिवार की शाम को 4:30 बजे भी लोकेंद्र टॉकीज चौराहे पर यही दृश्य बना। मैजिक वाला सवारी बैठा रहा था और स्कूल की बस बच्चों को छोड़ने के लिए जा रही थी, मगर मैजिक वाला हटाने को तैयार नहीं था। एक सरदार जी ने उसे डाटा भी की साइड में गाड़ी कर ले, ट्रैफिक जाम कर रखा है। मैजिक चालक पर कोई असर नहीं हुआ। रेंगते हुए कुछ समय बाद यातायात ठीक हुआ और स्कूल बस निकल पाई।

चौराहे सकड़े होने के कारण नियमों की अनदेखी कर जाते हुए वाहन
कलेक्टर से लेकर पार्षद तक सब खामोश
शहर की सड़कों पर साहबों की गाड़ियां सिर्फ बंद शीशों और सायरन के साथ ही निकलती हैं। प्रदेश के कैबिनेट मंत्री के अपने गृहनगर में जब प्रशासनिक रवैया ऐसा हो, तो बाकी प्रदेश का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। एसडीएम, सीएसपी, कलेक्टर, एसपी, निगमायुक्त, महापौर से लेकर स्थानीय पार्षद तक, सब के सब इस अव्यवस्था पर 'धृतराष्ट्र' की तरह आंखें मूंदे बैठे हैं। कलेक्टर से लेकर पार्षद तक सब खामोश है।
सेहत पर असर
जनता रोजाना ट्रैफिक जाम में घिसट रही है, घंटों गाड़ियों के जहरीले धुएं से फेफड़े खराब कर रही है और अपना समय-पेट्रोल बर्बाद कर रही है। लेकिन प्रशासन केवल अपने चहेतों की फाइलों को टेबल दर टेबल आगे खिसकाने में मशगूल है।
रतलाम की ज़मीनी हकीकत
⚫ चौराहों पर कमर्शियल चौकियां व बैरिकेड्स
⚫ चौराहों के मुहाने पर खड़े ऑटो/मैजिक
⚫ फुटपाथों पर दुकानदारों का अवैध कब्ज़ा
⚫ बाज़ारों में व्यवस्थित पार्किंग का अभाव
तिजोरियों की फिक्र, सरोकार शून्य
शहर के प्रमुख बाजारों में आज तक व्यवस्थित पार्किंग व्यवस्था तक नहीं बन पाई है। फुटपाथों पर दुकानदारों और रसूखदारों का पक्का कब्जा है, जिससे पैदल चलना भी दुश्वार हो चुका है। शहर का समुचित विकास कैसे हो, पार्किंग और यातायात की व्यवस्थाएं कैसे सुधरें—इन बुनियादी सवालों पर किसी अफ़सर या जनप्रतिनिधि के पास कोई ठोस योजना नहीं है।

मुद्दे की बात
नजर आती है प्रशासनिक असफलता
जनता चिल्ला-चिल्लाकर थक चुकी है, मीडिया बार-बार आईना दिखा रहा है, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि जिम्मेदार अफ़सर सिर्फ 'आराम की नौकरी' करने और धन कमाने के ध्येय से ही सिविल सेवा में आए हैं। यदि जल्द ही इन अव्यवस्थित चौकियों और बैरिकेड्स को हटाकर यातायात सुचारू नहीं किया गया और अवैध पार्किंग पर नकेल नहीं कसी गई, तो रतलाम की जनता का यह आक्रोश जल्द ही सड़कों पर प्रशासनिक असफलता का हिसाब मांगता नजर आएगा।
Hemant Bhatt