रतलाम जिले की हाल हकीकत : बिना फार्मासिस्ट चल रही थीं दुकानें, बिक रही थीं नशीली दवाएं!

कलेक्टर मिशा सिंह के कड़े रुख के बावजूद यदि धरातल पर अधिकारी केवल कागजी नोटिस का खेल खेलते रहेंगे, तो अवैध रूप से चल रहे मेडिकल स्टोर्स के हौसले पस्त होना मुश्किल है। रतलाम की जनता को कागजी खानापूर्ति नहीं, बल्कि नियम तोड़ने वाले मेडिकल संचालकों पर तात्कालिक तालाबंदी और ठोस दंडात्मक कार्रवाई की उम्मीद है।

रतलाम जिले की हाल हकीकत : बिना फार्मासिस्ट चल रही थीं दुकानें, बिक रही थीं नशीली दवाएं!

प्रशासनिक सुस्ती पर 'औचक निरीक्षण' का मरहम

⚫ कागजी नोटिसों के खेल में कब तक खिलवाड़ होगी मरीजों की जिंदगी?

⚫ सख्त कार्रवाई या सिर्फ 'नोटिस' का खानापूर्ति खेल?

⚫ सतत निरीक्षण' का दावा या महज पब्लिसिटी स्टंट?

⚫ ... तो अवैध रूप से चल रहे मेडिकल स्टोर्स के हौसले पस्त होना मुश्किल

हरमुद्दा
​रतलाम, 30 जुलाई। जिले के बाजना और शिवगढ़ क्षेत्र में औषधि प्रशासन द्वारा मेडिकल स्टोर्स पर की गई हालिया छापेमारी ने एक बार फिर जिले की स्वास्थ्य सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नियंत्रक खाद्य एवं औषधि प्रशासन भोपाल और कलेक्टर मिशा सिंह के निर्देशों का हवाला देकर औषधि निरीक्षक बलराम चौधरी ने कई दुकानों पर 'औचक निरीक्षण' तो किया, लेकिन कार्रवाई के नाम पर फिर वही पुराना ढर्रा 'कारण बताओ नोटिस' और 'दो दिन की मोहलत' का खेल सामने आया है।


​बिना फार्मासिस्ट चल रही थीं दुकानें, बिक रही थीं नशीली दवाएं!

​निरीक्षण के दौरान बाजना स्थित 'त्रिवेणी मल्टीस्पेशलिटी मेडिकल' और 'भवानी मेडिकल' पर कोई अधिकृत फार्मासिस्ट मौजूद ही नहीं था। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि त्रिवेणी मल्टीस्पेशलिटी मेडिकल में 'लोपेज' (Lopez) जैसी प्रतिबंधित/नारकोटिक्स श्रेणी की दवाइयों के इंजेक्शन भारी मात्रा में पाए गए। वहीं शिवगढ़ स्थित 'शिवाय मेडिकल' पर भी नारकोटिक्स दवा 'इक्विरेक्स' (Equirex) उपलब्ध थी। सवाल यह उठता है कि बिना फार्मासिस्ट के किसी मेडिकल स्टोर का संचालन होना सीधे तौर पर मरीजों की जान से खिलवाड़ नहीं तो और क्या है? बिना डॉक्टर के पर्चे और बिना किसी हिसाब-किताब के क्षेत्र में नशीली दवाइयों की बिक्री खुलेआम हो रही ?

​सख्त कार्रवाई या सिर्फ 'नोटिस' का खानापूर्ति खेल?

​गंभीर अनियमितताएं और संवेदनशील नशीली दवाएं मिलने के बावजूद औषधि विभाग का रुख ढीला नजर आता है। दुकानों को तुरंत सील करने या लाइसेंस रद्द करने की जगह उन्हें "2 दिन में क्रय-विक्रय अभिलेख प्रस्तुत करने" की मोहलत दी गई है।

​'सतत निरीक्षण' का दावा या महज पब्लिसिटी स्टंट?

​विभाग का कहना है कि जिले में सघन निरीक्षण का दौर जारी रहेगा। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दूरदराज के ग्रामीण इलाकों (जैसे बाजना और शिवगढ़) में बिना योग्य फार्मासिस्ट के धड़ल्ले से मेडिकल स्टोर चल रहे हैं और वहां शेड्यूल-एच व नारकोटिक्स दवाओं का कारोबार फल-फूल रहा है।
​प्रशासनिक स्तर पर केवल 'नोटिस जारी करने' और 'संतोषप्रद जवाब न मिलने पर निलंबन की चेतावनी देने' की प्रक्रिया इतनी लंबी खींच दी जाती है कि अंतिम कार्रवाई तक मामला ठंडा पड़ जाता है।

​जनहित में उठे प्रमुख सवाल

​अवैध भंडारण पर तत्काल FIR क्यों नहीं? नारकोटिक्स श्रेणी की दवाओं के अनाधिकृत रिकॉर्ड मिलने पर ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत सख्त आपराधिक मामला दर्ज क्यों नहीं किया गया? ग्रामीण क्षेत्रों की सुध कब? बाजना और शिवगढ़ जैसे आदिवासी बहुल और ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से चल रहे इस खेल पर विभाग की नींद इतने समय बाद ही क्यों खुलती है? या फिर केवल दिखावा भर है। रस्म अदायगी मान लीजिए। क्योंकि बिना गांधी दर्शन के कुछ भी संभव नहीं है।

​कितने लाइसेंस सच में रद्द हुए?

विभाग द्वारा हर बार 'कार्रवाई की जाएगी' का रटा-रटाया बयान दिया जाता है, लेकिन जनता यह जानना चाहती है कि पिछले 6 महीनों में कितने ढीले-ढाले मेडिकल स्टोर्स के लाइसेंस वास्तव में निरस्त किए गए?

तो अवैध रूप से चल रहे मेडिकल स्टोर्स के हौसले पस्त होना मुश्किल

कलेक्टर मिशा सिंह के कड़े रुख के बावजूद यदि धरातल पर अधिकारी केवल कागजी नोटिस का खेल खेलते रहेंगे, तो अवैध रूप से चल रहे मेडिकल स्टोर्स के हौसले पस्त होना मुश्किल है। रतलाम की जनता को कागजी खानापूर्ति नहीं, बल्कि नियम तोड़ने वाले मेडिकल संचालकों पर तात्कालिक तालाबंदी और ठोस दंडात्मक कार्रवाई की उम्मीद है।

मुद्दे की बात 

जब नशीली दवाइयों का रिकॉर्ड मौके पर मौजूद ही नहीं था, तो 48 घंटे का समय देना क्या साक्ष्यों से छेड़छाड़ या कागजी हेरफेर तैयार करने का मौका देना नहीं है?