एकलव्य के 'एकलव्य': 20 किमी का पैदल सफर, टूटी उम्मीदें और गूंजता सवाल— "साहब, हमें पढ़ाएगा कौन?"

​सरकार आदिवासी अंचल के होनहार बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने और उच्च स्तरीय शिक्षा देने के उद्देश्य से एकलव्य आवासीय विद्यालयों पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च करती है। लेकिन जब इन्हीं बच्चों को अपने पढ़ने के अधिकार और साफ पानी-टॉयलेट जैसी बुनियादी चीजों के लिए 20 किमी पैदल चलना पड़े, तो यह पूरी व्यवस्था पर एक गहरा दाग है।

एकलव्य के 'एकलव्य': 20 किमी का पैदल सफर, टूटी उम्मीदें और गूंजता सवाल— "साहब, हमें पढ़ाएगा कौन?"

⚫ ​विद्यार्थियों ने रूंधे गले और आक्रोशित स्वर में अपनी तीन मुख्य पीड़ाएँ रखी अधिकारियों के सामने 

⚫​ खामोश रही जुबान, बगलें झांकते रहे जिम्मेदार

⚫ एक गंभीर सोच और बड़ा सवाल

हरमुद्दा
​रतलाम, 26 अक्टूबर। जब व्यवस्थाएं गूंगी हो जाएं और जिम्मेदारों के कान पर जूं तक न रेंगे, तब मासूम कलम छोड़ सड़कों पर उतरने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसा ही एक हृदयविदारक दृश्य रतलाम की सड़कों पर देखने को मिला, जब आदिवासी अंचल सैलाना के ‘एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय’ के दर्जनों विद्यार्थी अपनी बुनियादी ज़रूरतों और हक की पढ़ाई के लिए 20 किलोमीटर का कठिन पैदल सफर तय कर सीधे कलेक्ट्रेट जा पहुंचे।


​छात्रों के चेहरों पर 20 किलोमीटर की थकान साफ़ झलक रही थी, लेकिन आँखों में व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश और अपनी बात जिले के मुखिया तक पहुँचाने की ज़िद थी। रास्ते में प्रशासनिक अधिकारियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, यह भी कहा कि कलेक्टर साहब छुट्टी पर हैं, लेकिन विद्यार्थियों का साफ कहना था— "हम अपनी पीड़ा सिर्फ कलेक्टर साहब को ही सुनाएंगे।"

​गाड़ियों से दौड़ा प्रशासनिक अमला, कलेक्ट्रेट में मची अफ़रा-तफ़री

​जैसे ही छात्रों के पैदल रतलाम कलेक्ट्रेट जाने की सूचना मिली, प्रशासनिक महकमे के बाजना तहसीलदार कुलभूषण शर्मा, सैलाना एसडीएम सुनील जायसवाल, जनजातीय कार्य विभाग की सहायक आयुक्त प्रियंका राय और नायब तहसीलदार आशीष उपाध्याय सहित अन्य अधिकारी कलेक्ट्रेट पहुँचे।

जो बात है हमें बताओ

​बाजना तहसीलदार श्री शर्मा बच्चों को समस्या बताने के लिए कहते हुए

कलेक्ट्रेट परिसर में ज़मीन पर बैठे बच्चों को समझाते हुए बाजना तहसीलदार कुलभूषण शर्मा ने कहा— "अब तो बता दो क्या समस्या है? क्यों इतना परेशान होकर यहाँ तक आए हो? जो बात है हमें बताओ।"
​परेशान और आक्रोशित विद्यार्थियों ने बिना हिचकिचाए अपनी आपबीती सुनाते हुए स्कूल की बदहाली की परतें उधेड़ दीं।
​"न शिक्षक हैं, न साफ-सफाई... आखिर कैसे पढ़ें हम?"
​विद्यार्थियों ने रूंधे गले और आक्रोशित स्वर में अपनी तीन मुख्य पीड़ाएँ अधिकारियों के सामने रखीं:

​भविष्य के साथ खिलवाड़: स्कूल को कहने को सीबीएसई (CBSE) पैटर्न पर संचालित बताया जाता है, लेकिन धरातल पर शिक्षकों का भारी अकाल है। कॉमर्स और अर्थशास्त्र जैसे महत्वपूर्ण विषयों को पढ़ाने वाला कोई शिक्षक ही नहीं है।

​अमानवीय हालात: हॉस्टल और स्कूल के वॉशरूम इतने गंदे और बदबूदार रहते हैं कि वहाँ जाना भी नारकीय अहसास कराता है। बुनियादी स्वच्छता तक उपलब्ध नहीं है।

​सिर्फ झूठे आश्वासन

विद्यार्थियों ने बताया कि वे कई बार जिम्मेदारों के आगे गुहार लगा चुके हैं। हर बार अधिकारी यही कहकर टाल देते हैं कि 'आएंगे, देखेंगे और समस्या सुलझा देंगे', लेकिन हकीकत में आज तक कुछ नहीं बदला।

​खामोश रही जुबान, बगलें झांकते रहे जिम्मेदार

​जब कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद अधिकारियों और मीडिया ने मौके पर मौजूद स्कूल की जिम्मेदार शिक्षिका ज्योति से इन अव्यवस्थाओं पर जवाब मांगा, तो उनके पास कहने को कुछ नहीं था। वे असहज होकर इधर-उधर बगलें झांकती नजर आईं। उनके मुंह से कुछ अस्पष्ट शब्द तो निकले, लेकिन न तो वह किसी को सुनाई दिए और न ही किसी की समझ में आए। यह खामोशी खुद स्कूल के प्रशासनिक ढांचे की नाकामी को बयां कर रही थी।

​'एक नजर में' खबर के मुख्य बिंदु

⚫ ​सड़कों पर 'एकलव्य': सैलाना से रतलाम तक 20 किमी की पैदल यात्रा कर कलेक्ट्रेट पहुंचे विद्यार्थी।

⚫ ​प्रशासनिक हड़कंप: सूचना मिलते ही एसडीएम, तहसीलदार और जनजातीय विभाग की सहायक आयुक्त गाड़ियों से कलेक्ट्रेट पहुंचे।

⚫ ​भविष्य पर संकट: कॉमर्स और अर्थशास्त्र के शिक्षकों का अभाव, सीबीएसई पैटर्न सिर्फ कागजों तक सीमित।

⚫ ​अस्वच्छता की मार: वॉशरूम की बेहद खराब स्थिति, बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते बच्चे।

​एक गंभीर सोच और बड़ा सवाल

​सरकार आदिवासी अंचल के होनहार बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने और उच्च स्तरीय शिक्षा देने के उद्देश्य से एकलव्य आवासीय विद्यालयों पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च करती है। लेकिन जब इन्हीं बच्चों को अपने पढ़ने के अधिकार और साफ पानी-टॉयलेट जैसी बुनियादी चीजों के लिए 20 किमी पैदल चलना पड़े, तो यह पूरी व्यवस्था पर एक गहरा दाग है। ​अब देखना यह होगा कि कलेक्ट्रेट पहुंचे इन मासूमों के पैरों के छालों और उनके दर्द को देखकर प्रशासन जागता है या फिर यह मामला भी फाइल बंद आश्वासनों में दफन होकर रह जाएगा?