शख्सियत : आधुनिकता की दौड़ में संजाबाई का पीछे छूट जाना उसकी कारूणिक नियति
आधुनिकता में हमारी सांस्कृतिक विरासत का तानाबाना कुछ इस तरह छिन्न- भिन्न हुआ कि उसके रेशे-रेशे छितरा गए हैं। ऐसे में यह भूल गए कि लोक परंपराएं मनुष्य को आपस में जोड़ने के साथ संवेदनशील भी बनाती हैं।’
⚫ कवयित्री निधि मानसिंह का कहना
⚫ नरेंद्र गौड़
’श्राध्दपक्ष के इन दिनों निमाड़, मालवा, गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्सों में लोकपर्व संजाबाई की धूम मचा करती थी। दीवार पर गोबर से विभिन्न आकृतियां बनाई जाती थी। उसे फूलों की पंखुड़ियों से सजाया जाता था। शाम के समय लोकगीत गाते हुए आरती उतारी जाती थी।

संजाबाई नी माँ
संजाबाई ने भेज्यो
करां संजा की आरती..
लेकिन टीवी इंटरनेट की दुनिया में न केवल संजाबाई वरन् अनेक लोकपर्व बहुत पीछे छूट चुके हैं। इन्हीं दिनों ’गड़बड्या’ और ’छल्लाबोल’ जैसे लोकपर्व भी घूम मचाते थे-
छल्ला बोल की बोली रे
भेंस को पोलो सिंग
जीमें बैठ्यो नाथू दर्जी
तो टोपो सीवे तीन
छल्ला बोलो छल्ला रे....
आधुनिकता में हमारी सांस्कृतिक विरासत का तानाबाना कुछ इस तरह छिन्न- भिन्न हुआ कि उसके रेशे-रेशे छितरा गए हैं। ऐसे में यह भूल गए कि लोक परंपराएं मनुष्य को आपस में जोड़ने के साथ संवेदनशील भी बनाती हैं।’

यह बात कवयित्री निधि मानसिंह ने कही। इन्होंने बताया कि संजापर्व पितृ पक्ष के 16 दिनों तक मनाया जाता है। निमाड़, मालवा गुजरात और राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा आज मरणासन्न स्थिति में है। यह पर्व मुख्य रूप से कुंवारी कन्याओं व्दारा बेहतर वर प्राप्ति की कामना को लेकर मनाया जाता है। यह पर्व विवाहित महिलाओं को उनके कुंवारे दिनों की याद दिला देता है और कई बार वे भी समवेत स्वरों में गा रही बालिकाओं के साथ गाने लगती हैं। बुजुर्ग महिलाओं को ऐसे बहुत से गीत याद होंगे, लेकिन उनके साथ ही यह परंपरिक गीत भी कालकलवित हो जाना हैं। सोलह दिनों तक रोज शाम को लड़कियां अपने घरों की दीवारों पर गोबर, मिट्टी, फूलों की पत्तियों से नित नई आकृतियां बनाती हैं। इनमें छाबड़ी, महिला, पुरूषों की आकृति, बैलगाड़ी, हाथी, सातिया आदि शामिल होते हैं। सोलहवें दिन किलाकोट, हाथी, घोड़े आदि की बड़ी आकृतियां बनाई जाती हैं। आरती उतारते हुए समवेत स्वरों में गाती हैं-
नानी सी गाड़ी लुढ़कती जाय
जीमें बैठ्या संजाबाई
घाघरों घमकाता जाय
चूड़लो चमकाता जाए
इसी तरह-
संजाबाई तम तमारा घरे जाओ
तमारी मां मारे गा....
कुटे गा देली में दचकारेगा
सांझ पड़ी गुजरात!
हिरणी का बड़ा-बड़ा दांत
छोरा-छोरी डरपेगा....
आरती के बाद कच्चा दूध, केला, कसार, ककड़ी, खोपरा आदि प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। सोलहवें दिन बालिकाएं भारी मन से संजाबाई को विदा करती हैं। दरअसल यह पर्व गोरा और पार्वती को समर्पित हैं। मान्यता है कि इन सोलह दिनों संजाबाई अपने मायके में रहती हैं और बाद में ससुराल चली जाती हैं। संजा की आकृति प्रत्येक दिन खुरच कर एक छाबड़ी में रखते जाते हैं और अंतिम दिन आदर के साथ यह नदी, तालाब के जल में तिरोहित कर दी जाती हैं।
सहेलियों में मेल मिलाप का जरिया
एक सवाल के जवाब में निधि जी ने बताया कि यह पर्व गीत, संगीत, कला कौशल और सहेलियों के बीच मेल-मिलाप का प्रतीक है। लोक परंपराओं को कम से कम प्राथमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। इस तरह की परंपराएं नष्ट होने का ही कारण है कि आज का मनुष्य लगातार क्रूर होता जा रहा है। एक आदमी बाढ़ के पानी में जान बचाने के लिए हाथ पैर मारता, सहायता के लिए पुकारता रहता है, लेकिन उसे बचाने बजाय लोग रील बनाने लगते हैं। घायल व्यक्ति सड़क पर पड़ा कराहता है, लेकिन उसे अस्पताल पहुंचाने के बजाय लोग कतराकर निकल जाते हैं। ऐसी संवेदनहीनता पचास-साठ के दशक में आज उतनी नहीं थी। संजाबाई ही नहीं हाथी आठम, गणगौर, वटपूजनी अमावस्या जैसे अनेक तमाम तीज त्योहार औपचारिक बनकर रह गए हैं। एक ही कमरे में पूरा परिवार बैठा अपने-अपने मोबाइल पर झुका रहता है। घंटों एक दूसरे से कोई वार्तालाप नहीं होता। ऐसे निर्मम समाज में लोकपर्व का पीछे छूट जाना उनकी कारूणिक नियति है।
गोबर मिलना तक दूभर
निधि जी का कहना था कि आज तो गोबर मिलना भी दूभर है। खेती किसानी की अर्थ व्यवस्था के दिनों लोग आज की तरह गायों को आवारा नहीं हांकते थे। अब तो दूध देती हैं, तभी तक गाय को बाड़े में बांधा जाता है और जैसे ही दूध नहीं देती आवारा छोड़ देते हैं। इन गायों के झुंड दुर्घटना के कारण बनते हंै। यह गायें धर्म भीरू महिलाओं व्दारा डाली रोटी के सहारे जिंदा रहती हैं। इनका गोबर घास खाने वाली गायों की अपेक्षा दोयम दर्जे का होता है जो बुरी तरह बदबू मारता है। ऐसे गोबर से संजा अंकन लड़कियों के लिए किसी यातना से कम नहीं है। कान्वेंट में पढ़ने वाली बालिकाएं ऐसे गोबर को उठाकर संजा बनाना दूर उसे छूना तक पसंद नहीं करती। वहीं आज कांक्रिट के पक्के मकान बन चुके हैं, जबकि संजा बनाने के लिए कच्ची दीवारें चाहिए। यही वजह है कि बाजारों में रेडीमेड संजा मिलने लगी हैं। कागज़ की ऐसी संजा को दीवार पर चिपका दिया जाता है। ऐसे में गोबर से अंकन की वह कलात्मकता गायब हो रही है। लोक पर्व, तीज त्योहार व्यावसायिकता की भेंट चढ़ चुके हैं।
त्योहारों पर चंदे का धंधा
निधि जी ने कहा कि गरबा उत्सव, गणेश चतुर्थी, रावण दहन के नाम पर समितियां बनती हैं, रसीद कट्टे छापे जाते हैं और मुस्तंड लड़कों की आवारा टोलियां गले में दुपट्टा डाले जबरिया चंदा उगाही के लिए निकल पड़ती हैं। पहले जहां गणेश और दुर्गा उत्सव के पंडालों में साहित्यिक एवं सांस्कृतिक आयोजन होते थे। गली मोहल्ले के बालक-बालिकाओं को अपनी प्रतिभा प्रदर्शन के मौके मिलते थे। उसके बजाए भजन के नाम डीजे पर हुडदंग होती है। वह भी ऐसी कि कमजोर दिल को अटैक आ जाए।
निधि जी की कविता पाठ्यक्रम में शामिल
निधि मानसिंह हिंदी साहित्य में एमए और बीएड कर चुकी हैं। अब पीएचडी करना चाहती हैं। इनके कविता संकलन ’नीली झील’, ’चुप्पिया’, ’शब्दों का खो जाना’ तथा साझा संग्रह ’मौन मुखर’ चर्चा में हैं। बाल कहानी संकलन ’कुएं का भूत’ और ’जयपुर की सैर’ को बच्चों ने बहुत सराहा। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं छपती रही है। इन्हें विभिन्न संस्थाओं व्दारा कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। उल्लेखनीय है कि इनकी बाल कविता ’परियों का देश’ को महाराष्ट्र राज्य के बाल भारती पाठ्यक्रम की कक्षा तीन की पुस्तक में शामिल किया जा चुका है। उत्तरप्रदेश के छोटे से कस्बे कांधला में जन्मी निधि जी बिठिंडा (पंजाब) में रहती हैं।
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निधि मानसिंह की कविताएं
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वह निश्छल मन अब
कहां से लाऊं?
वो निश्छल मन अब
कहाँ से लाऊंगी?
क्या अब मैं फिर से
पहले जैसी हो पाऊँगी?
अपनापन, फिक्र, प्यार
अब नहीं बचा किसी के लिए
दुख मे दर्द में सबके
साथ नहीं खड़ी हो पाऊँगी
अपने दर्द में सब को पुकारा
ढूंढती रही सबका सहारा
क्या अब किसी पे भी..
विश्वास कर पाऊँगी?
वो निश्छल मन अब
कहाँ से लाऊंगी?
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बिखराव भी जरूरी है
उसने छोड़ दिया
सब कुछ संभालना
अब वो.. देखना चाहता था
चीजों का रिश्तों का बिखरना
आखिर कब तक वो
सब कुछ संभालता
थक गया था वो सब कुछ
समेटते - समेटते!
अब वो देखना चाहता था
कहाँ तक बिखरेगा सब कुछ
कुछ तो ए - जिंदगी
तू भी संभाल
अब नहीं जागता रात भर
नही सताती कल की चिंता
थोड़ा सा लापरवाह हो गया
वो फिक्र करने वाला लड़का।
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बिना पंख उड़ती हैं अफवाहें
अफवाहें, चिड़िया नहीं
कबूतर नहीं बाज नहीं
फिर भी.. बिना पंख लगाए
बड़ी तेज उड़ती हैं
किसे आबाद करना है
किसे बर्बाद करना है?
हँसाना है रूलाना
ये बखूबी जानती हैं
बहुत जिद्दी, बहुत ढीठ
होती है ये निर्लज्ज
कब? कहाँ? किसका?
कहना मानती हैं
बड़ी खुश होकर
बातें चाशनी मे डुबोकर
कहाँ तक पहुंचानी है
उन सबको पहचानती है?
इसे फर्क नहीं पड़ता
किसी के जीने मरने से
कानाफूसी, झूठ, फरेब से
एक - दूजे से जुडती है
अफवाहें, चिड़िया नहीं
कबूतर नहीं, बाज नहीं
फिर भी... बिना पंख लगाए
बड़ी तेज उड़ती हैं।
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वो उदास लड़का
समझता है बाप की बेबसी
वो लड़का सबकी
बात भी समझता है
जज्बात भी समझता है
कोई बोले ना बोले -
फिर भी वो..
घर के सारे हालात भी
समझता है
माँ का अनकहा दर्द
बाप की बेबसी
बहन का कंधें पर रखा
हाथ समझता है
घर की हंसी
चेहरों की मुस्कान
कैसे कटते हैं सबके
दिन - रात समझता है
मगर.. नहीं समझता
तो कोई भी बस इतना
कैसे परदेश मे अकेला
वो घुट - घुट सुबकता है?
हाँ! वो लड़का जो
सबके जज्बात
समझता है।

Hemant Bhatt