फाइल-फाइल में झूलती 'सरकारी ज़मीन', शिकायतों के बावजूद रतलाम प्रशासन बेपरवाह!
यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह मान लिया जाएगा कि रतलाम में शासकीय जमीनों को भू-माफियाओं के हवाले छोड़ने की मौन स्वीकृति दी जा चुकी है।
⚫ मामला शासकीय चरागाह भूमि पर अवैध निर्माण का
⚫ जांच-पंचनामा सब हुआ
⚫ नहीं चला बुलडोजर
⚫ आमजन को कानूनी लड़ाई के लिए मजबूर कर रही प्रशासनिक सुस्ती
हरमुद्दा
रतलाम, 28 जुलाई। जिले में शासकीय संपत्ति और सार्वजनिक जमीनों की सुरक्षा को लेकर प्रशासनिक अमला कितना 'संवेदनशील' है, इसकी पोल नामली थाना क्षेत्र के ग्राम उसरगार से सामने आए एक मामले ने खोल कर रख दी है। ग्राम उसरगार की शासकीय चरागाह भूमि (सर्वे क्रमांक 51/1) पर बेधड़क हुए अवैध निर्माण को लेकर ग्रामीण लगातार कलेक्टर कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन शासन और प्रशासन की कान पर जूं तक नहीं रेंग रही।

यह पूरा मामला सिर्फ एक अवैध निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रतलाम प्रशासन की लचर, उदासीन और संदिग्ध कार्यप्रणाली पर भी सीधा तमाचा है। पंचनामा भी बना, निर्देश भी मिले... फिर फाइल में कौन सा 'दीमक' लग गया?

शिकायतकर्ता परमानंद नागदिया
मंगलवार को कलेक्ट्रेट में जनसुनवाई में आवेदन देने के लिए आए पीड़ित आवेदक परमानन्द पिता भेरूलालजी नागदिया और रमेश द्वारा कलेक्टर के समक्ष दर्ज कराई गई। शिकायतों की कई कॉपियां भी उन्होंने दिखाई। अब तक की गई कई शिकायतें प्रशासनिक ढर्रे का असली चेहरा उजागर करती हैं।
जांच में सच साबित हुई शिकायत
कलेक्टर के आदेश पर SLR (अधीक्षक भू-अभिलेख) की टीम ने मौके पर जाकर जांच की, पंचनामा बनाया और चरागाह भूमि पर वेयरहाउस व मकान के अवैध पक्के निर्माण की पुष्टि की।
कागजों तक सीमित निर्देश
जांच के बाद SLR द्वारा संबंधित तहसीलदार को अतिक्रमण हटाने व सख्त कार्रवाई के स्पष्ट निर्देश दिए गए।
अफसर बदलते रहे, अतिक्रमण बढ़ता रहा
तत्कालीन नायब तहसीलदार (पूर्वी भाग रतलाम शहर) ने स्वयं मौके पर पहुंचकर स्थल निरीक्षण किया। लेकिन नतीजा? शून्य! जांच रिपोर्ट और उच्च अधिकारियों के निर्देशों के बावजूद अतिक्रमण करने वालों मुकेश गेहलोद, अनिल पाटीदार, व सुनील पाटीदार के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। उल्टे, प्रशासनिक शह या ढिलाई का फायदा उठाकर मौके पर पक्के अवैध निर्माण पूरे हो गए।
सवाल प्रशासन से
क्या रसूखदारों के आगे नतमस्तक है राजस्व अमला? यह स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है।
निचले अमले की संदिग्ध भूमिका
जब जांच में अतिक्रमण साबित हो चुका है, तो तहसीलदार और राजस्व टीम कार्रवाई करने से क्यों कतरा रही है?
कलेक्टर आदेशों का अवमूल्यन
यदि जिले के सर्वोच्च अधिकारी (कलेक्टर) के समक्ष प्रस्तुत शिकायतों और दिए गए जांच आदेशों की यह गति है, तो आम नागरिक न्याय के लिए कहाँ जाए?
चरागाह भूमि पर डाका
मवेशियों और गांव के सार्वजनिक उपयोग की चरागाह भूमि पर निजी वेयरहाउस और मकान खड़े हो रहे हैं, और तंत्र आंखें मूंदे बैठा है।

आमजन की जागरूकता बनाम सिस्टम की नाकामी
इस पूरे प्रकरण का एक सकारात्मक पहलू यह है कि ग्राम उसरगार के ग्रामीण और पीड़ित पक्ष अपने अधिकारों और शासकीय संपत्ति की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह जागरूक हैं। नागरिक लगातार लिखित शिकायतों, जांच साक्ष्यों और वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए सिस्टम का दरवाजा खटखटा रहे हैं। लेकिन त्रासदी यह है कि नागरिकों की जागरूकता के सामने प्रशासन की निष्क्रियता भारी पड़ रही है। जब कानून का पालन कराने वाले ही जांच और पंचनामे को रद्दी की टोकरी में डाल देंगे, तो आमजन का 'सुशासन' के दावों से विश्वास उठना लाजमी है।
होना चाहिए ऐसा
शासकीय चरागाह भूमि किसी की निजी बपौती नहीं है। रतलाम कलेक्टर को इस मामले का तत्काल कड़ा संज्ञान लेना चाहिए।
दोषी अतिक्रमणकारियों के अवैध निर्माण पर तत्काल बुलडोजर चलाकर चरागाह भूमि मुक्त कराई जाए। जांच रिपोर्ट दबाने और कार्रवाई में लापरवाही बरतने वाले संबंधित राजस्व अधिकारियों/कर्मचारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
मुद्दे की बात

यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह मान लिया जाएगा कि रतलाम में शासकीय जमीनों को भू-माफियाओं के हवाले छोड़ने की मौन स्वीकृति दी जा चुकी है।
Hemant Bhatt