कलेक्टर ने पकड़ा आरसीएमएस पोर्टल पर 6,800 से अधिक प्रकरण दबाने का खेल:

रतलाम के राजस्व न्यायालयों ने इसे कागजी पेंडेंसी छुपाने का माध्यम बना दिया। जनता को "त्वरित और प्रभावी न्याय" तब तक नहीं मिल सकता, जब तक आंकड़ों को छिपाने की इस प्रवृत्ति पर नकेल न कसी जाए।

कलेक्टर ने पकड़ा आरसीएमएस पोर्टल पर 6,800 से अधिक प्रकरण दबाने का खेल:

क्या यह आंकड़ों की बाजीगरी से सुशासन का ढोंग है?

खुद कलेक्टर कोर्ट में 1,073 मामले दर्ज नहीं

पीड़ित कौन? केवल आम नागरिक

अनावश्यक देरी और भ्रष्टाचार की आशंका

हरमुद्दा
​रतलाम, 7 अगस्त। राजस्व मामलों में पारदर्शिता और त्वरित न्याय देने के दावे कागजों तक ही सीमित नजर आ रहे हैं। कलेक्टर अजय कटेसरिया द्वारा जिले की 27 राजस्व न्यायालयों के निरीक्षण में सामने आया 6,869 लंबित व गैर-अद्यतन प्रकरणों का आंकड़ा जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। प्रथम दृष्ट्या यह प्रशासनिक लापरवाही प्रतीत होती है, लेकिन गहराई से देखने पर यह प्रकरणों के आंकड़ों को कृत्रिम रूप से कम (अंडर-रिपोर्टिंग) दिखाने की एक सोची-समझी रणनीति अधिक लगती है।

कलेक्टर अजय कटेसरिया

'ऑनलाइन दर्ज नहीं तो पेंडेंसी नहीं', आंकड़ों की बाजीगरी

शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि हर राजस्व मामले की प्रविष्टि आरसीएमएस पोर्टल पर अनिवार्य रूप से हो, ताकि आम जनता को केस की स्थिति और अगली पेशी की पारदर्शी जानकारी मिल सके। परंतु, ज़मीनी हकीकत यह है कि जब मामलों को पोर्टल पर दर्ज ही नहीं किया जाएगा या पेशी के बाद स्टेटस अपडेट नहीं किया जाएगा, तो वरिष्ठ अधिकारियों या भोपाल में बैठे नीति-निर्माताओं को कागजों पर 'लंबित प्रकरणों की संख्या बेहद कम' दिखेगी। आंकड़ों की बाजीगरी पोर्टल पर प्रकरण दर्ज न करके जिले की पेंडेंसी को कागजों में "सुव्यवस्थित" और "कम" दिखाया जाता रहा।

खुद कलेक्टर कोर्ट में 1,073 मामले दर्ज नहीं

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि स्वयं कलेक्टर न्यायालय में ही 1,073 प्रकरण आरसीएमएस पर अपडेट नहीं पाए गए। इसके अलावा एसडीएम रतलाम शहर (743) और एसडीएम जावरा (640) जैसे बड़े अधिकारी कार्यालयों में भी यही खेल जारी था।

पीड़ित कौन? केवल आम नागरिक

जब मामला ऑनलाइन सिस्टम पर दर्ज ही नहीं होता या आगे नहीं बढ़ता, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को उठाना पड़ता है।

पारदर्शिता का अभाव

आम नागरिक अपनी ज़मीन, नामांतरण या सीमांकन की स्थिति जानने के लिए तहसील और एसडीएम कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर होते हैं।

अनावश्यक देरी और भ्रष्टाचार की आशंका

जो प्रकरण सिस्टम में दर्ज नहीं होते, उनके गुम होने, सुनवाई टलने या 'लेन-देन' के चक्कर में सालों-साल लटके रहने की गुंजाइश बढ़ जाती है।

केवल निर्देशों से सुधरेगी व्यवस्था या होगी दंडात्मक कार्रवाई?

कलेक्टर ने समीक्षा बैठक में चिंता व्यक्त करते हुए समय-सीमा में प्रकरण दर्ज करने और निराकरण के निर्देश दिए हैं। परंतु सवाल यह उठता है कि इतने बड़े पैमाने पर लंबे समय से चल रही इस लापरवाही के लिए जवाबदेह अधिकारियों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई? जब तक पोर्टल पर प्रकरण दर्ज न करने वाले पीठासीन अधिकारियों और संबंधित अमले (रीडर/क्लर्क) पर जवाबदेही तय कर कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक केवल निर्देशों के औपचारिक पुलिंदे से यह व्यवस्था नहीं बदलने वाली।

मुद्दे की बात

जरूर ऐसी प्रवृत्ति पर नकेल कसने की

आरसीएमएस पोर्टल को आम जनता को सुविधा देने के लिए बनाया गया था, लेकिन रतलाम के राजस्व न्यायालयों ने इसे कागजी पेंडेंसी छुपाने का माध्यम बना दिया। जनता को "त्वरित और प्रभावी न्याय" तब तक नहीं मिल सकता, जब तक आंकड़ों को छिपाने की इस प्रवृत्ति पर नकेल न कसी जाए।