सामाजिक सरोकार : UPI पर 'मर्चेंट चार्ज' का सच: क्या व्यापारी की जेब से निकलेगा पैसा या अंततः जनता ही चुकाएगी कीमत?

मर्चेंट ट्रांजैक्शन चार्जेस को लेकर समय-समय पर जारी दिशा-निर्देशों ने एक बड़ी आर्थिक बहस को जन्म दे दिया है। यद्यपि कागजों पर यह कहा गया है कि आम उपभोक्ताओं से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा और यह शुल्क केवल व्यापारियों (Merchants) पर लागू होगा, लेकिन आर्थिक धरातल पर इसकी अंतिम मार देश की 140 करोड़ जनता की जेब पर पड़ना तय माना जा रहा है।

सामाजिक सरोकार : UPI पर 'मर्चेंट चार्ज' का सच: क्या व्यापारी की जेब से निकलेगा पैसा या अंततः जनता ही चुकाएगी कीमत?

जमील एहमद खिलजी, कर सलाहकार

देश में डिजिटल लेनदेन का सबसे बड़ा माध्यम बन चुका यूपीआई (UPI) एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। सरकार और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) द्वारा मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) या मर्चेंट ट्रांजैक्शन चार्जेस को लेकर समय-समय पर जारी दिशा-निर्देशों ने एक बड़ी आर्थिक बहस को जन्म दे दिया है। यद्यपि कागजों पर यह कहा गया है कि आम उपभोक्ताओं से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा और यह शुल्क केवल व्यापारियों (Merchants) पर लागू होगा, लेकिन आर्थिक धरातल पर इसकी अंतिम मार देश की 140 करोड़ जनता की जेब पर पड़ना तय माना जा रहा है।

​आंकड़ों की नजर से यूपीआई का दायरा

​दैनिक लेनदेन: देश में हर दिन औसतन 40 से 45 करोड़ से अधिक यूपीआई लेनदेन होते हैं।

​मासिक वॉल्यूम: हर महीने लगभग 1300 से 1500 करोड़ डिजिटल ट्रांजैक्शन यूपीआई के जरिए पूरे किए जाते हैं।

​बाजार में हिस्सेदारी: कुल खुदरा डिजिटल भुगतान (Retail Digital Payments) में अकेला यूपीआई लगभग 80% से अधिक की हिस्सेदारी रखता है।

​व्यापारी वर्ग की रणनीति: जेब से नहीं, ग्राहक से भरपाई
​अर्थशास्त्र का सीधा नियम है कि जब भी किसी व्यवसाय पर कोई नया कर या शुल्क लगाया जाता है, तो व्यापारी उसे अपनी जेब से चुकाने के बजाय 'लागत' (Cost of Doing Business) में जोड़ देता है। यूपीआई चार्ज के मामले में भी व्यापारी वर्ग दो तरीके से इसकी भरपाई करने के लिए विवश होगा:

​सामान के दामों में प्रत्यक्ष वृद्धि: यदि व्यापारी को किसी भुगतान पर 0.5% या 1.1% तक का मर्चेंट शुल्क देना पड़ता है, तो वह वस्तु की एमआरपी (MRP) या बिक्री मूल्य में उसी अनुपात में बढ़ोतरी कर देगा।

​गुणवत्ता या मात्रा में कटौती: मूल्य न बढ़ाने की स्थिति में उत्पाद का वजन घटाना (Shrinkflation) या हल्की गुणवत्ता की सामग्री का उपयोग करना दूसरा व्यावहारिक रास्ता बन जाता है।

​परोक्ष कराधान,बिना भेद-भाव के हर नागरिक पर असर


​डिजिटल इंडिया के इस दौर में यूपीआई का उपयोग समाज के हर वर्ग द्वारा किया जा रहा है—चाहे वह बड़े शहरों के मॉल हों या गांवों की राशन दुकान। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह किसी जाति, धर्म या राजनीतिक विचारधारा को देखकर लागू नहीं होती।
​चाहे वह सत्ता पक्ष का समर्थक हो या विपक्ष का, हिंदू हो, मुस्लिम, सिख या ईसाई—जब व्यापारी अपनी बढ़ी हुई लागत की भरपाई के लिए सामान के दाम बढ़ाएगा, तो इसका आर्थिक बोझ देश का हर एक नागरिक समान रूप से उठाएगा।

अंततः यही है बाजार का सच

​मुद्दे की बात तो यही है कि नीतिगत स्तर पर भले ही यह संदेश दिया जाए कि यह शुल्क केवल व्यावसायिक संस्थाओं से वसूल किया जा रहा है, लेकिन बाज़ार का सच यही है कि अंततः अंतिम उपभोक्ता (End Consumer) ही इस पूरे ढांचे का खर्च वहन करता है। मर्चेंट पर लगा कोई भी शुल्क अप्रत्यक्ष रूप से आम जनता की क्रय शक्ति (Purchasing Power) को प्रभावित करता है।

जमील एहमद खिलजी, कर सलाहकार