मुद्दे की बात : एनकाउंटर संस्कृति और त्वरित न्याय की मांग: क्या यह कानून के राज का विकल्प बन सकती है?
हरियाणा के करनाल में हुई वीरू वाल्मीकि की निर्मम हत्या के बाद परिजनों और समाज द्वारा आरोपियों के सीधे एनकाउंटर की मांग ने एक बार फिर देश में न्याय प्रक्रिया, नागरिक हताशा और त्वरित न्याय के रुझान पर गंभीर बहस छेड़ दी है। पीड़ित परिवार का यह रुख कि "हमें सिर्फ एनकाउंटर चाहिए, और कुछ नहीं," समाज के उस बढ़ते अविश्वास को दर्शाता है
⚫ हेमंत भट्ट
हाल ही में हरियाणा के करनाल में हुई वीरू वाल्मीकि की निर्मम हत्या के बाद परिजनों और समाज द्वारा आरोपियों के सीधे एनकाउंटर की मांग ने एक बार फिर देश में न्याय प्रक्रिया, नागरिक हताशा और त्वरित न्याय के रुझान पर गंभीर बहस छेड़ दी है। पीड़ित परिवार का यह रुख कि "हमें सिर्फ एनकाउंटर चाहिए, और कुछ नहीं," समाज के उस बढ़ते अविश्वास को दर्शाता है जो हमारी मौजूदा सुस्त और उलझी हुई न्यायिक व्यवस्था के प्रति पनप रहा है। ताज्जुब की बात तो यह है कि पुलिस ने एनकाउंटर कर भी दिया।

त्वरित न्याय की जन-आकांक्षा के पीछे का तर्क
आमजन में एनकाउंटर जैसी कार्रवाई के प्रति समर्थन अचानक नहीं बढ़ा है। इसके पीछे व्यावहारिक और सामाजिक कारण हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
न्यायिक विलंब और प्रक्रियाओं की जटिलता:
भारतीय अदालतों में मुकदमों के निस्तारण में दशकों लग जाते हैं। "देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है" की उक्ति आज धरातल पर सच साबित हो रही है।
संसाधनों की बर्बादी
गंभीर और जघन्य अपराधियों पर सालों-साल चलने वाले मुकदमों में सरकारी मशीनरी, न्यायाधीशों और वकीलों का समय व भारी पैसा खर्च होता है। साथ ही, मानवाधिकारों के नाम पर जेलों में बंद अपराधियों के रखरखाव पर भी करदाताओं का पैसा पानी की तरह बहाया जाता है।
अपराधियों के हौसले और भागने का जोखिम
अक्सर देखने में आता है कि रसूखदार या शातिर अपराधी जमानत पर बाहर आकर गवाहों को डराते हैं, सबूत मिटाते हैं या पेशी के दौरान फरार हो जाते हैं। ऐसे में समाज खुद को असुरक्षित महसूस करता है।
एनकाउंटर ही तार्किक
इन कारणों से जब कोई अपराधी सरेआम अपराध की जिम्मेदारी लेता है, तो पीड़ित पक्ष को न्यायिक लंबी लड़ाई की जगह मौके पर ही सजा (Instant Justice) ज्यादा व्यावहारिक और तार्किक लगती है।
एनकाउंटर न्याय अल्पकालिक राहत या दीर्घकालिक खतरा?
भले ही एनकाउंटर से समाज को तत्काल मानसिक शांति और अपराधियों में भय का संदेश मिलता दिखे, लेकिन एक सभ्य और लोकतांत्रिक समाज के लिए यह प्रवृत्ति कई गंभीर सवाल भी खड़े करती है।
निर्दोषों के शिकार होने का जोखिम:
यदि बिना अदालती जांच के पुलिस को सजा देने का अधिकार मिल जाए, तो सत्ता या पुलिस के दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाती है। इसमें किसी निर्दोष के मारे जाने पर उसे सुधारने का कोई विकल्प नहीं बचता।
संवैधानिक ढांचे को क्षति
भारतीय संविधान 'कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया' (Rule of Law) पर आधारित है। जब कार्यपालिका (पुलिस) ही न्यायपालिका (कोर्ट) का काम करने लगे, तो न्यायिक व्यवस्था का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है।
मूल समस्याओं की अनदेखी
एनकाउंटर किसी अपराध का स्थायी समाधान नहीं है। यह पुलिस सुधारों, जांच प्रणाली के आधुनिकीकरण और त्वरित न्यायिक सुधारों की तात्कालिक लीपापोती बनकर रह जाता है।
राह क्या हो?
जनता द्वारा एनकाउंटर की मांग वास्तव में हमारी कानून-व्यवस्था के प्रति आक्रोश और लाचारी का प्रतीक है। इस जन-आक्रोश को दबाने या केवल एनकाउंटर को अंतिम विकल्प मानने के बजाय व्यवस्था में बुनियादी सुधार की सख्त आवश्यकता है।
फास्ट-ट्रैक अदालतों की वास्तविक सक्रियता
जघन्य अपराधों (जैसे हत्या, बलात्कार) के मामलों में समयसीमा तय हो कि 3 से 6 महीने के भीतर फैसला आए।
पुलिस जांच प्रणाली में सुधार
पुलिस की जांच शाखा और कानून-व्यवस्था शाखा को अलग किया जाए, ताकि पुख्ता सबूत जुटाए जा सकें और अपराधी कानूनी छिद्रों का फायदा न उठा सकें।
जमानत और अपील के नियमों में कड़ाई
पेशेवर और दुस्साहसी अपराधियों के लिए जमानत और बार-बार अपील की प्रक्रिया को सख्त बनाया जाए। जब तक आम नागरिक को यह विश्वास नहीं होगा कि अदालत से उसे समय रहते न्याय और अपराधी को कड़ी सजा मिलेगी, तब तक एनकाउंटर जैसी गैर-न्यायिक मांगों का समर्थन बढ़ता रहेगा। समाजहित इसी में है कि न्याय त्वरित हो, निष्पक्ष हो और कानून के दायरे में रहकर ही दिया जाए।
Hemant Bhatt