श्रद्धांजलि : धर्मपरायण एवं समाजसेवी तेजकुंवरबाई काश्यप का निधन

श्रद्धांजलि : धर्मपरायण एवं समाजसेवी तेजकुंवरबाई काश्यप का निधन

⚫ कैबिनेट मंत्री चेतन्य काश्यप को मातृशोक, 

⚫ अंतिम यात्रा 12 अक्टूबर को प्रातः 10ः30 बजे रतलाम स्थित निवास से निकलेगी

हरमुद्दा
रतलाम, 11 अक्टूबर। मध्यप्रदेश शासन के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री चेतन्य काश्यप एवं भावना-शैलेन्द्र मानावत की माताजी, धर्मपरायण एवं समाजसेवी श्रीमती तेजकुंवरबाई काश्यप का रविवार, 11 अक्टूबर 2026 को मुंबई में लंबी अस्वस्थता के पश्चात निधन हो गया। वे 83 वर्ष की थी। प्रसिद्ध युवा संगीतकार एवं उद्योगपति सिद्धार्थ काश्यप एवं श्रवण काश्यप की दादीजी तथा समीक्षा एवं सारांश की परदादीजी के निधन से काश्यप परिवार सहित धार्मिक, सामाजिक एवं सेवा क्षेत्र में शोक व्याप्त है।


दिवंगत श्रीमती तेजकुंवरबाई काश्यप की अंतिम यात्रा सोमवार, 12 अक्टूबर 2026 को प्रातः 10ः30 बजे उनके निवास ‘वीसाजी मेंशन’, स्टेशन रोड, रतलाम से निकलेगी। श्रीमती तेजकुंवरबाई काश्यप का जन्म 17 मार्च 1943 को मध्यप्रदेश के कुक्षी में हुआ था। उनके पिता स्व. श्री चंपालालजी खूंटवाला ने पालिताना तीर्थ में त्रिस्तुतिक जैन समाज की प्रथम धर्मशाला ‘चंपा निवास’ का निर्माण करवाया था।

मात्र 6 साल का रहा दांपत्य जीवन

वर्ष 1958 में उनका विवाह रतलाम के श्री अशोक कुमारजी काश्यप से हुआ। वर्ष 1964 में पति के आकस्मिक निधन के बाद मात्र 21 वर्ष की आयु में उन्होंने अदम्य साहस और धैर्य के साथ परिवार की जिम्मेदारियां संभालीं। पुत्र चेतन्य एवं पुत्री भावना के पालन-पोषण, उन्हें सुसंस्कारित बनाने तथा पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन के साथ उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन धर्म, तपस्या एवं जनसेवा को समर्पित कर दिया।

सामाजिक गतिविधियों में जीवनपर्यंत सक्रिय

धर्म, तपस्या और साधना के प्रति उनका विशेष समर्पण रहा। उन्होंने अपने जीवन में दो वर्षीतप, एक मासक्षमण, नौ एवं आठ उपवास तथा बीस स्थानक ओलीजी सहित अनेक कठिन तपस्याएं पूर्ण कीं। सम्मेद शिखरजी, पालिताना, गिरनार सहित देश-विदेश के विभिन्न जैन तीर्थों की यात्राएं कीं। वे धार्मिक एवं सामाजिक गतिविधियों में जीवनपर्यंत सक्रिय रहीं।

आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान

समाजसेवा के क्षेत्र में उनका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। वर्ष 2005 में चेतन्य काश्यप फाउण्डेशन द्वारा रतलाम में स्थापित ‘अहिंसा ग्राम’ में उन्होंने 100 जरूरतमंद परिवारों के पुनर्वास, स्वावलंबन और संस्कार निर्माण के कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई। महिलाओं को सिलाई, बुनाई, कढ़ाई एवं अन्य कौशलों का प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार से जोड़ने तथा स्वसहायता समूहों के माध्यम से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

महिलाओं को जोड़ा धर्म, शिक्षा, संस्कार समाज सेवा से

मुंबई स्थित आदर्श मानव सेवा ट्रस्ट एवं आदर्श जैन हेल्थ सेंटर सहित विभिन्न जनकल्याणकारी संस्थाओं से जुड़कर उन्होंने जरूरतमंदों की चिकित्सा, सहायता एवं सेवा के कार्यों में योगदान दिया। उन्होंने पार्श्वनाथ महिला मंडल की स्थापना की तथा विभिन्न धार्मिक महिला मंडलों का नेतृत्व करते हुए महिलाओं को धर्म, संस्कार और समाजसेवा से जोड़ा। सादगी, दृढ़ संकल्प, वात्सल्य, धर्मनिष्ठा और सेवाभाव से परिपूर्ण उनका जीवन अनेक लोगों के लिए प्रेरणास्रोत रहा। उनके निधन से परिवार ने अपनी मार्गदर्शक एवं स्नेहमयी मातृशक्ति को खो दिया है।