​दर्द यह है कि मेरे रतलाम शहर का कोई हमदर्द नहीं

यह केवल एक शहर की व्यथा नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक और राजनीतिक लाचारगी का नग्न प्रदर्शन है, जहाँ 'जनसेवा' केवल कागज़ों, पोस्टरों और भाषणों तक सीमित होकर रह गई है। रतलाम की गलियों में बहता गंदा पानी, सीवरेज लाइन के माध्यम से घरों में घुसती गन्दगी, बदबू कीचड़ में सिसकती जनता और मंडी में बहती किसानों की खून-पसीने की कमाई (प्याज)—यह सब केवल एक घंटे की बारिश का नतीजा नहीं है, यह बरसों की प्रशासनिक बेरुखी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अकाल का परिणाम है।

​दर्द यह है कि मेरे रतलाम शहर का कोई हमदर्द नहीं

⚫'ट्रिपल इंजन सरकार' के नीचे कुचली रतलाम की जनता

⚫ हेमंत भट्ट

​रतलाम को क्या नहीं मिला? यहाँ भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के कलेक्टर हैं, पुलिस अधीक्षक (IPS) हैं, नगर निगम कमिश्नर हैं, इंजीनियरों की फौज है और विभागों की लंबी-चौड़ी सूची है। राजनीतिक मोर्चे पर देखें तो 'ट्रिपल इंजन' का दंभ भरने वाली भाजपा सरकार के कैबिनेट मंत्री, विधायक, महापौर, जिला पंचायत अध्यक्ष और पार्षदों की पूरी जमात मौजूद है। अरबों रुपयों का बजट आता है, योजनाओं की फाइलें बनती हैं, फीते कटते हैं।

​लेकिन सवाल यह है कि इतना सब होने के बाद भी रतलाम बदहाल क्यों है? जवाब साफ़ और कड़वा है—इस शहर के पास ओहदेदार तो बहुत हैं, लेकिन 'हमदर्द' एक भी नहीं।


​आईएएस-आईपीएस की 'नौकरीपेशा' मानसिकता और तालमेल का अकाल

​रतलाम में सबसे बड़ा प्रशासनिक मज़ाक कलेक्टर और निगम कमिश्नर के बीच का तालमेल है, जो ज़मीन पर ढूँढे नहीं मिलता। सर्वोच्च पदों पर बैठे अधिकारियों के लिए रतलाम शायद केवल एक 'पोस्टिंग' है—एक पड़ाव, जहाँ कार्यकाल पूरा करना है, वेतन लेना है और आगे बढ़ जाना है। शहर की जलभराव की समस्या हो या गंदे पेयजल की आपूर्ति, न कोई दूरगामी कार्ययोजना (Master Plan) बनती है, न ज़मीनी हकीकत का निरीक्षण होता है। जब एक घंटे की झमाझम बारिश में पूरा शहर टापू बन जाए और मंडी में किसानों का प्याज पानी में तैरने लगे, तो समझ जाना चाहिए कि जिला प्रशासन की 'तैयारी' केवल बैठकों की चाय और बिस्कुट तक सीमित थी।

नेताओं की आत्ममुग्धता और जनता पर दोषारोपण

​राजनीतिक नेतृत्व की स्थिति और भी शर्मनाक है। जब शहर डूबता है, जब जनता नल से आते बदबूदार-गंदे पानी को पीने पर मजबूर होती है, तो महापौर और स्थानीय प्रतिनिधि अपनी नाकामी छुपाने के लिए जनता की ही गलतियाँ निकालने लगते हैं।

​सफाई कर्मचारी सड़कों का कचरा नालियों में डाल देते हैं या उसे जलाकर इतिश्री कर लेते हैं, लेकिन ठीकरा जनता के सिर फोड़ा जाता है। करोड़ों रुपये जल शोधन और ड्रेनेज सिस्टम के नाम पर 'पानी' की तरह बहा दिए गए, लेकिन नतीजा शून्य है।
​जब सत्ता में 'ट्रिपल इंजन' जुड़ा हो, फिर भी जनता दुविधा और बदहाली में जी रही हो, तो यह मानना पड़ेगा कि इंजन चाहे जितने लगा लो, अगर नीयत में खोट है तो गाड़ी गड्ढे में ही गिरेगी।

'सुविधा' के नाम पर 'दुविधा' और इंजीनियरों की कार्यशैली

​इंजीनियरों की कार्यकुशलता पर तो जितना कम कहा जाए उतना बेहतर है। शहर में ऐसा लगता है कि निर्माण कार्य सुधारने के लिए नहीं, बल्कि अगली बारिश में बह जाने के लिए किए जाते हैं, ताकि नया टेंडर जारी हो सके। घटिया निर्माण, बिना दूरदर्शिता के नालियों का ढाँचा और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ते प्रोजेक्ट्स, यही रतलाम की नियति बन चुकी है। निरीक्षण करने वाले अधिकारी एसी कमरों से बाहर नहीं निकलते और कमियाँ कभी सुधरती नहीं।

​धन संचय की होड़ और इतिहास की सीख

​"पूत कपूत तो क्यों धन संचय, पूत सपूत तो क्यों धन संचय।"
​कुर्सियों और पदों पर बैठे जिम्मेदार शायद यह भूल चुके हैं कि अनैतिक तरीके से जुटाया गया धन और जन-आह लेकर कमाया गया रुतबा कभी स्थाई नहीं होता। यदि ईश्वर ने बड़ा ओहदा, शक्ति और अधिकार दिए हैं, तो वह जनता की सेवा के लिए हैं, न कि अपनी जेबें भरने और अपनी नौकरी बजाने के लिए।

​इतिहास गवाह है कि नाम हमेशा काम से होता है, बड़ी-बड़ी गाड़ियों और हुकूमत से नहीं। आज भले ही अपनी नाकामियों पर पर्दा डालकर खुशफहमी पाल ली जाए, लेकिन जब जनता के सब्र का बाँध टूटता है और जब प्यासे, बेबस और परेशान नागरिकों के दिल से 'बद्दुआ' निकलती है, तो बड़े-बड़े साम्राज्य और आभामंडल ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं।

​मुद्दे की बात

चेत जाओ जिम्मेदारो!

​यह केवल एक शहर की व्यथा नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक और राजनीतिक लाचारगी का नग्न प्रदर्शन है, जहाँ 'जनसेवा' केवल कागज़ों, पोस्टरों और भाषणों तक सीमित होकर रह गई है। रतलाम की गलियों में बहता गंदा पानी, गन्दगी, सीवरेज लाइन के माध्यम से घरों में घुसती गंदगी, बदबू, कीचड़ में सिसकती जनता और मंडी में बहती किसानों की खून-पसीने की कमाई (प्याज)—यह सब केवल एक घंटे की बारिश का नतीजा नहीं है, यह बरसों की प्रशासनिक बेरुखी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अकाल का परिणाम है।

घटिया खेल से ऊब चुकी है जनता

रतलाम की जनता अब झूठे आश्वासनों, बैठकों के फोटो-ऑप और एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालने के घटिया खेल से ऊब चुकी है। राजनीति और नौकरी अपनी जगह कीजिए, लेकिन कम से कम इस शहर को जीने लायक तो छोड़ दीजिए। अगर ज़रा सी भी गैरत बाकी है, तो अपने वातानुकूलित दफ़्तरों से बाहर निकलिए, कीचड़ में उतरिए और उस जनता का दर्द समझिए जिसकी बदौलत आप उस कुर्सी पर बैठे हैं। वरना इतिहास रतलाम के इस दौर को प्रशासनिक नाकामी और राजनीतिक संवेदनहीनता के सबसे काले पन्नों में दर्ज करेगा।