नगर निगम का छल या योजना की विफलता? 208 गरीब दलित परिवारों को आशियाना देकर किया बेघर
⚫ कांग्रेस के पूर्व विधायक एवं महापौर पारस सकलेचा ने पत्रकार वार्ता में कहा
⚫ अवैध कब्जे का झूठा आरोप
⚫ वैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन
हरमुद्दा
रतलाम,6 अगस्त। 50-60 वर्षों से शिवनगर, प्रकाशनगर और जावरा रोड की झोपड़पट्टियों में पुश्तैनी रूप से निवास कर रहे सैकड़ों गरीब परिवारों के साथ प्रशासनिक संवेदनहीनता है। वर्ष 2020-21 के दौरान नगर निगम ने इन झुग्गीवासियों को यह भरोसा दिलाकर उनके आशियाने खाली करवाए थे कि उन्हें मात्र ₹20,000 की मार्जिन मनी जमा करनी होगी और शेष ₹1,80,000 का बैंक ऋण नगर निगम स्वयं उपलब्ध कराएगा।इसी भरोसे पर गरीबों ने अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़ दी। लेकिन आज 4-5 साल से उन्हीं फ्लैटों में रह रहे 208 दलित एवं बीपीएल परिवारों को नगर निगम ने अचानक 'अतिक्रमणकारी' बताकर उनके फ्लैटों पर ताले जड़ दिए और उनका सामान बाहर फेंक दिया।

पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए श्री सकलेचा
यह बात कांग्रेस के नेता, पूर्व विधायक के महापौर पारस सकलेचा ने पत्रकार वार्ता के दौरान कही। इस दौरान शहर कांग्रेस अध्यक्ष शांतिलाल वर्मा, मयंक जाट सहित अन्य मौजूद थे
प्रशासनिक षड्यंत्र और गंभीर सवाल
नगर निगम ने 396 में से केवल 166 लोगों को ही ऋण दिलाया, जबकि बाकी 208 परिवारों ने भी शर्त अनुसार ₹20,000 मार्जिन मनी जमा कर दी थी, जिसके बाद उन्हें फ्लैट और कब्जा आवंटित किया गया था। अब नगर निगम खराब सिबिल स्कोर का बहाना बना रहा है। सवाल यह उठता है कि यदि सिबिल के कारण ऋण संभव नहीं था, तो पहले झुग्गियां क्यों तोड़ी गईं? खराब सिबिल की स्थिति में बैंक के जोनल ऑफिस को विशेष अनुमति देने का अधिकार होता है। नगर निगम ने अपनी प्रशासनिक क्षमता का उपयोग कर जोनल ऑफिस से समन्वय क्यों नहीं किया?
वैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन
मध्य प्रदेश नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 की धारा 173, 174 और 175 के तहत वसूली की एक स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया तय है। नगर निगम ने न तो 30 दिन का अंतिम मांग नोटिस दिया, न आवंटन निरस्तीकरण की विधिवत सूचना दी और न ही बेदखली वारंट जारी किया।
अवैध कब्जे का झूठा आरोप
श्री सकलेश्या ने कहा कि जब पीड़ितों से ₹20,000 की मार्जिन मनी जमा कराकर विधिवत फ्लैट की चाबियां और आवंटन पत्र दिए गए थे, तो अंतिम सूचना पत्र में उन्हें "अवैध अतिक्रमणकारी" कैसे लिख दिया गया? जब तक मार्जिन मनी जमा है, आवंटन रद्द कैसे माना जा सकता है? यदि रद्द किया भी गया, तो राशि क्यों नहीं लौटाई गई?
जनसुनवाई से इनकार
4 अगस्त को जब पीड़ित परिवार आयुक्त से मिलकर यह गुहार लगाने गए कि उन्हें ऋण दिलाया जाए और वे पैसा भरने को तैयार हैं, तब आयुक्त ने उनका ज्ञापन लेने तक से मना कर दिया। अंततः पीड़ितों को पंजीकृत डाक से पत्र भेजना पड़ा।
अपराधिक कृत्य और एफआईआर की मांग
बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के घरों में जबरन घुसना, दलित और बीपीएल परिवारों का सामान बाहर फेंकना और फ्लैटों को सील करना सीधे तौर पर 'भारतीय न्याय संहिता' (BNS) के तहत लोक सेवक द्वारा कानून की अवहेलना और अधिकारों के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है। पीड़ित परिवारों के लिए कांग्रेस नेताओं ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष आपराधिक जांच की मांग करते हुए दोषी अधिकारियों के खिलाफ तत्काल प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने की मांग की है।
Hemant Bhatt