मदर्स डे पर विशेष : साहित्यकार अज़हर हाशमी जी का मां के प्रति कृतज्ञता भाव
मां शब्द की ध्वनि मंदिर के उस पवित्र शंख ध्वनि के समान है जिसके कानों में पड़ते ही मन - मस्तिष्क और हृदय पवित्रता से भर जाता है। मां शब्द अथाह सिंधु की तरह है जिसका कोई मापक यंत्र आज तक नहीं बना और न बन पाएगा।
⚫ श्वेता नागर
मां शब्द की ध्वनि मंदिर के उस पवित्र शंख ध्वनि के समान है जिसके कानों में पड़ते ही मन - मस्तिष्क और हृदय पवित्रता से भर जाता है। मां शब्द स्वयं में पूर्णता लिए हुए है। इसलिए मां शब्द की व्याख्या करना संभव नहीं। क्योंकि इस शब्द को जितना व्याख्यायित किया जाता है, यह उतना विस्तार पाता जाता है ।
मां शब्द अथाह सिंधु की तरह है जिसका कोई मापक यंत्र आज तक नहीं बना और न बन पाएगा।

मां की इसी अनंत महिमा को अपने साहित्य में सर्वोपरि स्थान देने वाले और मां के प्रति अपनी अंजुरी में कृतज्ञता का जल भरकर प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि, गीता मनीषी, वेदों के ज्ञाता, भारतीय संस्कृति के अध्येता और सूफ़ी परम्परा के संवाहक प्रो. अज़हर हाशमी जी कहते हैं -
"बलाएं जब कभी भी नींद में मुझको सताती हैं ,
मैं, मां का नाम लेता हूं , बलाएं भाग जाती हैं ।"
वाकई में मां बच्चे के लिए उस काले टीके की तरह होती है, जो हर नकारात्मक प्रभाव से बच्चे की रक्षा करती है। भारतीय ज्योतिष में मां का प्रतिनिधित्व करने वाला ग्रह चंद्रमा है। चंद्रमा मन का कारक होता है। इसका अर्थ है मां जितनी भावनात्मक और मानसिक रूप से मजबूत होगी, वह कभी भी बच्चे का आत्मविश्वास कम नहीं होने देगी, वैसे भी मां को बच्चे का प्रथम गुरु कहा गया है जो बच्चे में संस्कारों का सृजन करती है।
अज़हर हाशमी जी ने भी अपनी इन काव्य पंक्तियों में इन्हीं भावों को व्यक्त किया है -
"मां
प्रथम गुरु है
जो
सिखाती है संतान को
सच्चाई का सबक
शौर्य की शब्दावली
और
अपनत्व के अक्षर।"
मां परिवार की धूरी है । मां के बिना घर ,घर नहीं होता है ।
परिवार और घर की परिभाषा मां के बिना पूर्ण नहीं हो सकती । परिवार में जो कड़ी एक- दूसरे को जोड़े रखती है वह होती है एक -दूसरे के प्रति समर्पण और अनुराग का भाव, और इस कड़ी को मजबूत करता है मां का वात्सल्य भाव, और इसी के महत्व को रेखांकित करती अज़हर हाशमी जी की काव्य पंक्तियां -
"बनाए रखती है
जोश की जलधारा के साथ
परिवार की परिधि में ,
प्रेम का प्रवाह
और
वात्सल्य का वेग
सम्यक दृष्टि के साथ
मां
जैसे
सरिता समत्व की ।"
प्रो. अज़हर हाशमी जी का साहित्य सौहार्द्र और सर्वधर्म समभाव का संदेशवाहक है। बिना किसी अंतर /भेद के वे सभी धर्मों को ग्रहण करने योग्य सीख और संस्कार को हमेशा अपने साहित्य में प्रचारित और प्रसारित करने से नहीं चूकते । वे इसे अपना धर्म और कर्म मानते हैं। इसी सौहार्द भाव को उन्होंने मां के उदार भाव से जोड़कर समझाने का प्रयास किया है -
"नवरात्र - पर्युषण सहित रमजान - सी पावन ,
त्याग -तप के दिन - ब - दिन विस्तार जैसी मां।"
जब किसी संकट में हम स्वयं को पाते हैं तो मां का स्मरण संकटमोचक की तरह करते हैं , क्योंकि हमारा विश्वास है कि मां की दुआओं में । मां के इस संकटमोचक स्वरूप की व्याख्या हाशमी जी ने कुछ इस तरह की है -
"एक साथ ही मां के अद्भुत तीन रूप हैं -
दया का दरिया, दवा की बूटी, दुआ का आंचल ।"
और मां की इन्हीं दुआओं को याद करते हुए हाशमी जी की कई बार आँखें भर आती हैं। म. प्र. साहित्य अकादमी से प्रकाशित साक्षात्कार पत्रिका में उनके जीवन और साहित्य से जुड़े पहलुओं पर साक्षात्कार प्रकाशित किया गया था, जिसमें उन्होंने अपने बचपन के बारे में बात करते हुए बताया था कि -
"मेरे पिताजी श्री खुर्शीद अली हाशमी सूफ़ी संत थे , वे कुरान के हाफिज थे । मेरी माताजी श्रीमती रशीदा हाशमी जिन्होंने मुझे जन्म दिया, उनका तब निधन हो गया था जब मैं केवल डेढ़ वर्ष की आयु का था । मेरा पालन - पोषण करने के लिए मेरे पिताजी ने दूसरा विवाह किया था । मेरा पालन- पोषण करने वाली मां श्रीमती खातून हाशमी ने अपने जीवन की सारी सुख - सुविधाओं का त्याग कर मेरी शिक्षा के लिए उन्होंने कई बार अपने चांदी के जेवर गिरवी रखे और बेचे भी । इसलिए मेरा पालन - पोषण करने वाली मेरी मां का दर्ज़ा मेरे लिए जन्म देने वाली मां से भी बढ़कर है।"
और अपनी मां के इस समर्पण भाव के प्रति वे इस कदर समर्पित हुए कि उन्होंने यह निश्चय कर लिया था कि उनका जीवन समाज और राष्ट्र के लिए ही है ।
साहित्यकार अज़हर हाशमी जी की इन पंक्तियों के साथ इस आलेख का समापन करना मुझे प्रासंगिक प्रतीत होता है -
"मेरी ताकत को कोई भूल से भी कम नहीं आंके,
मेरी ताकत मेरी निश्छल - सरल मां की दुआएं हैं।"
⚫ श्वेता नागर
Hemant Bhatt