खरी खरी : अधिकारियों का पब्लिसिटी स्टंट और बदहाल रतलाम, खाकी की सुस्ती या अपराधियों को छूट?
खरी खरी : अधिकारियों का पब्लिसिटी स्टंट और बदहाल रतलाम, खाकी की सुस्ती या अपराधियों को छूट?
⚫ ज़मीनी हक़ीकत बनाम मीडिया का मायाजाल
⚫ रतलाम में कानून-व्यवस्था वेंटिलेटर पर
हेमंत भट्ट
प्रशासनिक पदभार संभालते ही मीडिया को सिरे से नकारना और संवाद के दरवाज़े बंद करने का दावा करना, किसी अधिकारी की कार्यशैली का हिस्सा हो सकता है। लेकिन जब वही अधिकारी हर दिन एक नए स्टंट के ज़रिए अख़बारों और सोशल मीडिया की सुर्खियों में बने रहने की होड़ में शामिल हो जाए, तो जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। चाट के ठेले पर खड़े होना, मेडिकल कॉलेज का अचानक निरीक्षण, दफ़्तरों में फ़ाइलों को देखकर फोटो खिंचवाना, बच्चों को गोद में उठाकर पोज़ देना या पोखर का अस्वच्छ पानी पीकर फ़िल्टर न करने की अजीब सलाह देना—यह सब जनसेवा कम और 'छपास की बीमारी' व आत्म-प्रशंसा की भूख अधिक प्रतीत होती है।
अफ़सोस की बात यह है कि शासकीय जनसंपर्क विभाग इन दिखावटी कारनामों के कसीदे गढ़ने में व्यस्त है, जबकि ज़मीनी स्तर पर रतलाम शहर और ज़िले की स्थिति जस की तस बनी हुई है।
अधूरी व्यवस्थाएं और बुनियादी समस्याएं
यातायात और अतिक्रमण: शहर की सड़कें दिन-ब-दिन संकरी और बदहाल होती जा रही हैं। यातायात प्रबंधन के नाम पर कोई ठोस योजना नहीं है और अतिक्रमण हटाने की प्रशासनिक मंशा पूरी तरह नदारद है।
आवारा पशु और कुत्तों का आतंक: सड़कों पर घूमते आवारा मवेशी हादसों को न्योता दे रहे हैं। आवारा कुत्तों के काटने से आम नागरिक, विशेषकर बच्चे और बुज़ुर्ग, दहशत के साये में जीने को मजबूर हैं, लेकिन प्रशासन को इससे कोई सरोकार नहीं है।
स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा: जिला चिकित्सालय की लचर व्यवस्थाएं और मरीजों की परेशानियां किसी से छिपी नहीं हैं। केवल औचक निरीक्षण के नाम पर पब्लिसिटी बटोरने से अस्पताल की स्थिति सुधरने वाली नहीं है।
जनसुनवाई का विकेंद्रीकरण: जनसुनवाई जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत करने के नाम पर बंद कर देना आमजन के विश्वास पर चोट पहुँचाने जैसा है। दूर-दराज़ से आने वाले ग्रामीण और शहर के लोग अब अपनी समस्याओं के समाधान के लिए भटकने को मजबूर हैं।
तो जमीनी बदलाव नहीं आता
जब समस्याओं का समाधान करने के बजाय केवल मीडिया में बने रहने के लिए नए-नए पैंतरे अपनाए जाते हैं, तो जनता का प्रशासन पर से विश्वास उठने लगता है। शहरवासियों को समझ आ चुका है कि फ़िल्मी अंदाज़ में किए गए निरीक्षणों और फोटो-सेशन से ज़मीनी बदलाव नहीं आता।
जरूरत वास्तविक समाधान की
रतलाम को इस समय प्रचार के भूखे 'स्टंट' की नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, ठोस नीतियों और जनसमस्याओं के वास्तविक समाधान की आवश्यकता है। अधिकारी कागज़ों और सुर्खियों से बाहर निकलकर यदि ज़मीनी समस्याओं—जैसे यातायात, स्वास्थ्य, अतिक्रमण और सार्वजनिक सुरक्षा—पर ध्यान दें, तभी रतलाम का वास्तविक विकास संभव हो सकेगा।
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खाकी की सुस्ती या अपराधियों को छूट? रतलाम में कानून-व्यवस्था वेंटिलेटर पर
रतलाम शहर की सड़कों पर रात ढलते ही कानून का खौफ नहीं, बल्कि अपराधियों का राज नजर आने लगता है। एमडी ड्रग्स के जहर से घिसटती युवा पीढ़ी, जगह-जगह सरेआम चलती शराबखोरी, बेखौफ घूमते लुटेरे और एक ही कॉलोनी को बार-बार निशाना बनाते चोर—ये किसी क्राइम थ्रिलर फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि रतलाम शहर की कड़वी सच्चाई है। जिला पुलिस प्रशासन हर मोर्चे पर पूरी तरह नाकाम और नकारा साबित हो चुका है।
तो इनकी सड़कों पर मौजूद की किस काम की
हालत यह हो चुकी है कि आम नागरिक अपने घर पर ताला लगाकर दो दिन के लिए बाहर जाने की हिम्मत खो चुका है। चोरों का दुस्साहस इस कदर बढ़ गया है कि लेनार्ड सिटी जैसी कॉलोनियों में लगातार घुसपैठ हो रही है। पांच दिन पहले हुई पत्थरबाजी की दहशत अभी मिटी भी नहीं थी कि बीती रात एक रहवासी के अस्पताल जाते ही चोरों ने फिर धावा बोल दिया। यह महज चोरी का प्रयास नहीं, बल्कि पुलिस गश्त के मुंह पर एक तमाचा है। जब शहर का आम नागरिक रात को चैन से सो नहीं सकता, तो आखिर रतलाम पुलिस की सड़कों पर मौजूदगी किस काम की है?
पुलिस की नाकामी के चार बड़े प्रमाण
सीसीटीवी के पीछे छिपती पुलिस: रात की नाइट गश्त पूरी तरह कागजी घोड़ों पर दौड़ रही है। पुलिसकर्मी सड़कों पर मुस्तैद रहने के बजाय सिर्फ सीसीटीवी कैमरों के भरोसे दफ्तरों में बैठे हैं। अपराध रोकने की प्राथमिक जिम्मेदारी से मुंह मोड़कर घटना के बाद सिर्फ फुटेज खंगालना पुलिसिंग नहीं कहलाता।
ध्वनि प्रदूषण और गुंडागर्दी पर मौन: रात 10 बजे के बाद सुप्रीम कोर्ट और गाइडलाइंस के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए लाउडस्पीकर, डीजे और ध्वनि विस्तारक यंत्र शहर में बेधड़क बज रहे हैं। रात के सन्नाटे में पटाखे फोड़ती बुलेट गाड़ियां सड़कों पर फर्राटा भरती हैं, लेकिन किसी पुलिस प्वाइंट या डायल 112 को ये आवाजें सुनाई नहीं देतीं। पुलिस का यही कहना होता है की शिकायत होगी तो कार्रवाई करेंगे।
नशे और अवैध कारोबार को मौन संरक्षण: एमडी ड्रग्स और अवैध शराब का कारोबार गली-मोहल्लों में पांव पसार चुका है। नशीले पदार्थों की सुगम उपलब्धता ही लूट, झपटमारी और चोरी की घटनाओं की मुख्य वजह बन रही है, जिस पर कसौटी कसने में महकमा पूरी तरह नाकाम रहा है।
सड़क से गायब 'खाकी का खौफ': अपराधियों के मन से पुलिस का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है। गश्त के नाम पर सिर्फ औपचारिक गाड़ियां घूमती हैं, जबकि असामाजिक तत्व आधी रात तक चौराहों और कॉलोनियों के मुहाने पर जमावड़ा लगाए रहते हैं।
आमजन के जीवन से शांति और सुकून गायब
रतलाम की जनता ने पुलिस को शांति और सुरक्षा के नाम पर व्यवस्था सौंपी थी, लेकिन आज आमजन के जीवन से शांति और सुकून पूरी तरह गायब हो चुका है। अगर महकमे के आला अधिकारियों ने अपनी नींद नहीं तोड़ी और सड़कों पर उतरकर वास्तविक गश्त, धरपकड़ और ठोस कार्रवाई की 'फटकार' नहीं लगाई, तो रतलाम का आम नागरिक अपने हक और सुरक्षा के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर होगा। अब बातों और बयानों का वक्त बीत चुका है, रतलाम पुलिस को जमीन पर सख्त और ठोस नतीजे दिखाने होंगे।
Hemant Bhatt