पाँच-पाँच साल तक फाइलों को दबाए बैठे रहे तहसीलदार! कारण बताओ नोटिस के नाम पर प्रशासनिक लीपापोती कब तक?
महज 'नोटिस' ही क्यों, निलंबन क्यों नहीं? प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि जब लापरवाही इतनी गंभीर है और मामला वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों की अवहेलना से जुड़ा है, तो केवल "दो दिन में स्पष्टीकरण" मांगने की औपचारिकता क्यों?
⚫ एक ‘जांच रिपोर्ट’ के अभाव में फांक रहे धूल
⚫ न्यायालयीन व्यवस्था पर तमाचा
⚫ सिविल सेवा नियमों की धज्जियां
हरमुद्दा
रतलाम, 9 अगस्त। जिले में प्रशासनिक लापरवाही और अफसरशाही का आलम यह है कि संभागायुक्त (उज्जैन) के आदेशों और कलेक्टर के निर्देशों तक की खुलेआम अवहेलना की जा रही है। 5-5 सालों से अटकी फाइलों और लंबित न्यायालयीन मामलों पर वर्षों तक मौन साधे रखने के बाद, अब प्रशासन की नींद खुली है।

कलेक्टर अजय कटेसरिया
अब तक के अन्य कलेक्टर की तरह कलेक्टर अजय कटेसरिया ने रतलाम शहर के तहसीलदार कुलभूषण शर्मा को कारण बताओ नोटिस थमाकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की है। लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि जो मामला 5 साल से अधिक समय से अटका हुआ था, तो कार्रवाई तत्कालीन कलेक्टर और तहसीलदार पर होनी चाहिए, हाल ही में आए उन पर कार्रवाई क्यों? उस पर अब तक समीक्षा क्यों नहीं हुई? क्या जनता को न्याय और राजस्व मामलों में समयबद्ध कार्रवाई सिर्फ कागजों में ही मिलेगी?
क्या है पूरा मामला?
उज्जैन संभागायुक्त के निर्देशों के तहत कलेक्टर न्यायालय में दर्ज विभिन्न प्रकरणों (क्रमांक 04, 05, 06, 09, 011, 012, 014, 015, 016/अ-21/2021-22) में जमीन के वर्तमान उपयोग और मौके की वास्तविक स्थिति पर जांच प्रतिवेदन मांगा गया था। यह प्रतिवेदन तहसीलदार रतलाम शहर कुलभूषण शर्मा को मात्र 7 दिनों के भीतर एसडीएम रतलाम ग्रामीण के माध्यम से कलेक्टर न्यायालय में पेश करना था। 6 अगस्त 2026 को हुई समीक्षा बैठक में यह हैरान करने वाला तथ्य सामने आया कि वर्ष 2021-22 के ये प्रकरण 5 वर्षों से ज्यादा समय से महज एक ‘जांच रिपोर्ट’ के अभाव में धूल फांक रहे हैं।
न्यायालयीन व्यवस्था पर तमाचा
संभागायुक्त और कलेक्टर जैसे वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों को ठेंगे पर रखकर जांच रिपोर्ट दबाए रखी गई। यह कृत्य मध्यप्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम 3(1)(i), 3(1)(ii) और 3(1)(iii) का स्पष्ट उल्लंघन है, जो शासकीय कर्तव्यों में गंभीर लापरवाही, कदाचरण और अवहेलना को दर्शाता है। जिस काम के लिए 7 दिन का वक्त दिया गया था, वह 5 साल बीत जाने के बाद भी पूरा नहीं हुआ।
जनता का सवाल
महज 'नोटिस' ही क्यों, निलंबन क्यों नहीं?
प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि जब लापरवाही इतनी गंभीर है और मामला वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों की अवहेलना से जुड़ा है, तो केवल "दो दिन में स्पष्टीकरण" मांगने की औपचारिकता क्यों? आमतौर पर आम नागरिकों के काम में एक दिन की देरी होने पर राजस्व अमला नियमों का पाठ पढ़ाने लगता है, लेकिन जब खुद तहसीलदार स्तर का अधिकारी 5 साल तक महत्वपूर्ण फाइलों को अटका कर बैठा रहे, तो कार्रवाई के नाम पर केवल नोटिस जारी कर दिया जाता है।
मुद्दे की बात

अब देखना यह होगा कि दो दिन में मिलने वाले स्पष्टीकरण के बाद कलेक्टर इस गंभीर कदाचरण पर कोई ठोस अनुशासनात्मक कार्रवाई (जैसे निलंबन या विभागीय जांच) करते हैं, या फिर यह मामला भी अन्य जांच रिपोर्टों की तरह फाइलों के नीचे दबा दिया जाएगा।
Hemant Bhatt