कलेक्ट्रेट में 'सिस्टम' का भद्दा मजाक: दिव्यांगों के रैंप पर पानी और कीचड़ का पहरा, कैसे मिलें साहब से?

कलेक्ट्रेट में 'सिस्टम' का भद्दा मजाक: दिव्यांगों के रैंप पर पानी और कीचड़ का पहरा, कैसे मिलें साहब से?

​न व्हीलचेयर का रास्ता, न पैरों से चलने वालों को राहत

क्या तमाम आला अधिकारियों को जमा पानी नजर नहीं आता

अधिकारियों की उपस्थिति और कार्य शैली पर सवालिया निशान

हरमुद्दा
​रतलाम, 29 जुलाई। जिला प्रशासन भले ही सुशासन, संवेदनशीलता और 'सबका साथ-सबका विकास' के लंबे-चौड़े दावे करता हो, लेकिन जिले के सबसे बड़े प्रशासनिक केंद्र—कलेक्ट्रेट की जमीनी हकीकत इन दावों की कलई खोल रही है।
​अधिकारियों की चौखट तक पहुंचने के लिए दिव्यांगजनों की सुविधा के नाम पर रैंप तो बनवा दिया गया है, लेकिन उसकी शुरुआत ही जलभराव और कीचड़ के साम्राज्य से होती है। रैंप के मुहाने पर जमा गंदा पानी चीख-चीख कर यह बता रहा है कि कलेक्ट्रेट का प्रबंधन किस कदर संवेदनहीन और आंखें मूंदे बैठा है।

​न व्हीलचेयर का रास्ता, न पैरों से चलने वालों को राहत

​सवाल यह उठता है कि आखिर पैरों से अस्वस्थ व्यक्ति इस गंदे पानी और कीचड़ को पार करके अंदर कैसे दाखिल हो?
​व्हीलचेयर की स्थिति: यदि कोई दिव्यांग व्यक्ति व्हीलचेयर पर सवार होकर आता है, तो उसे लाने वाले अटेंडेंट को मजबूरन उस गंदे पानी में उतरना पड़ेगा।

कीचड़ वाले पानी से बचकर निकलते हुए अटेंडर

और मशक्कत के बाद निकले गंदे पानी से

समस्या बताने आए हो तो गुजरना होगा दिव्यांगजनों को

यदि कलेक्ट्रेट में व्हीलचेयर उपलब्ध न हो, तो पैरों से लाचार दिव्यांगजन को अपने हाथों और शरीर को उस बदबूदार, दूषित पानी और कीचड़ में घसीटते हुए अपनी फरियाद लेकर अधिकारियों तक जाना होगा। क्या अपनी समस्या सुनाने के लिए दिव्यांगों को यह अपमानजनक सजा भुगतनी पड़ेगी?

क्या तमाम आला अधिकारियों को जमा पानी नजर नहीं आता

​साहबों की 'दिव्य' आंखें, जो सिर्फ फाइलों को देखती हैं
​कलेक्ट्रेट परिसर में हर दिन जिले के तमाम आला अधिकारी, प्रशासनिक अमला और कर्मचारी गाड़ियों के लंबे काफिले के साथ आवाजाही करते हैं। जिस मुख्य मार्ग या प्रवेश द्वार से रोजाना कलेक्टर और अन्य वरिष्ठ अधिकारी गुजरते हैं, क्या उन्हें वहां जमा यह पानी दिखाई नहीं देता?

अधिकारियों की उपस्थिति और कार्य शैली पर सवालिया निशान

जो प्रशासनिक अमला कलेक्ट्रेट के मुहाने पर जमा कुछ लीटर पानी की निकासी का सही इंतजाम नहीं कर पा रहा, वह पूरे जिले की समस्याओं का समाधान कैसे करेगा? इतनी छोटी सी बुनियादी समस्या का नजर न आना अधिकारियों की कार्यशैली और उनकी उपस्थिति पर गहरा सवालिया निशान खड़ा करता है।

मुद्दे की बात

​सुधार का इंतजार या सिर्फ संवेदनहीनता?

​सरकारी दफ्तरों को 'दिव्यांग मित्र' बनाने के निर्देश कागजों में भले ही मुकम्मल हों, लेकिन रतलाम कलेक्ट्रेट का यह रैंप प्रशासनिक लापरवाही की बानगी भर है। अब देखना यह है कि हरमुद्दा डॉट कॉम पर इस मुद्दे के प्रसारण के बाद कलेक्ट्रेट का प्रबंधन नींद से जागता है या फिर दिव्यांगजन यूं ही सिस्टम की संवेदनहीनता का शिकार होते रहेंगे।