आजादी के जश्न में पसीना बच्चों का, वाहवाही बटोरने मंच पर चढ़े संस्था प्रमुख
स्वतंत्रता दिवस का आयोजन बच्चों के भीतर राष्ट्रीयता और स्वस्थ मनोरंजन का संचार करने के लिए होता है, न कि उनमें वैमनस्यता बीज बोने के लिए। शासन और प्रशासन को इस परंपरा पर तुरंत नकेल कसनी होगी। पुरस्कार मंच से हर टीम के प्रतिनिधि विद्यार्थियों को ही दिए जाएं।
⚫ स्वतंत्रता दिवस के मुख्य समारोह में बिखरा प्रतिभाओं का दम
⚫ पुरस्कार के वक्त बच्चों के हिस्से आई सिर्फ उपेक्षा
हेमंत भट्ट
रतलाम में स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर मुख्य समारोह में जिस चमक और उत्साह की गूंज सुनाई देती है, उसके पीछे नौनिहालों का हफ्तों का कड़ा परिश्रम छिपा होता है। करीब 20 दिनों की हाड़-तोड़ मेहनत और कड़ी धूप में रोजाना 4 से 5 घंटे अभ्यास के बाद चयनित 5 स्कूलों के लगभग 2000 विद्यार्थियों ने इस बार भी अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से दर्शकदीर्घा में बैठे आईएएस-आईपीएस अधिकारियों और विशिष्ट अतिथियों को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया। उनकी पढ़ाई भी प्रभावित हुई। क्योंकि उन्हें शिक्षक शिक्षिकाओं के आदेश का पालन जो करना था।

लेकिन, त्रासदी देखिए—जैसे ही रंगारंग प्रस्तुतियां खत्म हुईं और पुरस्कार वितरण का समय आया, अपनी कला का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले वे बच्चे मंच के पास भी नजर नहीं आए। उन्हें वाहनों में भरकर चुपचाप वापस उनके स्कूलों की तरफ रवाना कर दिया गया। और जिन संस्था प्रमुखों, प्राचार्यों और शिक्षकों की भागीदारी इन प्रस्तुतियों में केवल औपचारिक मार्गदर्शन तक सीमित थी,

वे 15-20 का झुंड बनाकर मंच पर पुरस्कार और ट्रॉफी झपटने पहुंच गए, अपने ड्रेस कोड के साथ। बच्चों की सफलता का श्रेय लेने में इन्हें जरा भी शर्म और हिचक महसूस नहीं हुई।

पुरस्कार बच्चों की प्रतिभा का या संस्था प्रमुखों की 'हेकड़ी' का?
विद्यार्थी धूप और पसीने में केवल इसलिए मेहनत करते हैं कि जिले के सर्वोच्च अधिकारियों के सामने जब उनका नाम पुकारा जाए, तो वे गर्व से अपनी मेहनत का सम्मान प्राप्त कर सकें। लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा और संस्था प्रमुखों की स्वार्थी मानसिकता ने इस मंच को बच्चों के प्रोत्साहन का जरिया बनाने के बजाय प्राचार्यों का 'फोटो सेशन' बनाकर रख दिया है। एक ड्रेस कोड में पुरस्कार लेने पहुंच जाते हैं।

न्याय संगत और तर्कसंगत नहीं
यह पूरी कवायद संस्था प्रमुखों द्वारा खुद के 'शिक्षक पुरस्कार' या 'राष्ट्रपति पुरस्कार' के आवेदन में अपनी उपलब्धियां गिनवाने और प्रशासनिक अधिकारियों के सामने अपनी हेकड़ी दिखाने का जरिया बन चुकी है। 10 से 15 मिनट का अतिरिक्त समय बचाकर बच्चों की कला और उनकी भावना का इस तरह अनादर करना न तो न्यायसंगत है और न ही तर्कसंगत। इतना ही नहीं जिस स्थान पर उन्होंने प्रस्तुत यदि वहां पर बिछाई गई चोरी भी उनके घुटनों और पैरों को पीड़ा दे रही थी।
गुटबाजी और 'सेटिंग' से आहत होता बच्चों का मन
मुख्य समारोह की सांस्कृतिक स्पर्धाओं में जिस तरह के निर्णय सामने आते हैं, वे अक्सर निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हैं। पर्दे के पीछे की 'सेटिंग' के कारण जब प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कारों की घोषणा होती है, तो उसका सीधा असर बच्चों के कोमल मन पर पड़ता है। वैसे भी जहां पर निर्णायक को बिठाया जाता है, वहां से उन्हें सांस्कृतिक उत्सव का आधा ही नजर आता है, आधा तो छुप जाता है। मगर यह भी एक औपचारिकता पूरी कर दी जाती है। क्योंकि यह निर्णायक स्कूलों में अभ्यास के दौरान तो जाते हैं नहीं। एक दिन पहले अधिकारियों की पत्नियों को निर्णायक बनाकर खाना पूर्ति कर दी जाती है।
ईर्ष्या और कटुता
स्थान पाने वाले बच्चे अन्य प्रतिभागियों पर तंज कसते हैं, जिससे बच्चों के बीच प्रतिस्पर्धा की जगह दुश्मनी और हीनभावना पनपने लगती है। क्योंकि इतनी मेहनत के बाद भी जब कुछ नहीं मिलता है तो विद्यार्थियों का कमल मन जरूर आहत होता है।
समान सम्मान की दरकार
जब प्रशासन खुद चुनिंदा 5 सर्वश्रेष्ठ स्कूलों का चयन करता है, तो फिर 300-400 बच्चों की हर टीम को समान रूप से पुरस्कृत क्यों नहीं किया जा सकता?
प्रशासनिक दूरदर्शिता की सख्त जरूरत
स्वतंत्रता दिवस का आयोजन बच्चों के भीतर राष्ट्रीयता और स्वस्थ मनोरंजन का संचार करने के लिए होता है, न कि उनमें वैमनस्यता बीज बोने के लिए। शासन और प्रशासन को इस परंपरा पर तुरंत नकेल कसनी होगी। पुरस्कार मंच से हर टीम के प्रतिनिधि विद्यार्थियों को ही दिए जाएं। भले ही इसमें 15 मिनट अधिक लग जाएं। साथ ही, चयन प्रक्रिया में 'प्रतिस्पर्धा' के बजाय सभी चयनित स्कूलों को 'समान सम्मान' देने की नीति अपनाई जानी चाहिए, ताकि आजादी का यह राष्ट्रीय पर्व सच मायने में बच्चों के लिए सार्थक और प्रेरणादायी बन सके।
Hemant Bhatt